भारत शूद्रों का होगा: एक क्रांतिकारी दृष्टि की समीक्षा : दिनेश कुमार माली
भारत शूद्रों का होगा: एक क्रांतिकारी दृष्टि की समीक्षा
परिचय
समीक्षक : दिनेश कुमार माली
"भारत शूद्रों का होगा" किशन पटनायक द्वारा रचित एक ऐसी पुस्तक है जो भारतीय राजनीति और समाज की गहरी परतों को उघाड़ती है। वरिष्ठ राजनीतिक विचारक और कार्यकर्ता किशन पटनायक की यह पहली पूर्ण पुस्तक है, जो 2022 में सेतु प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। पटनायक, जो सक्रिय राजनीतिकर्मी के रूप में जाने जाते हैं, न कि पारंपरिक लेखक के रूप में, इस ग्रंथ में शूद्रों—यानी बहुजन समाज—की ऐतिहासिक शोषण की कहानी को एक आशावादी भविष्य के साथ जोड़ते हैं। पुस्तक का शीर्षक विवेकानंद की भविष्यवाणी पर आधारित है, जो सुनने में एक नारा-सा लगता है,और कांशीराम मायावती के बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के विचारों को प्रतिध्वनित करता है कि भारत का भविष्य शूद्रों के हाथों में होगा। यह पुस्तक मात्र 126 पृष्ठों की है, लेकिन इसके विचारों की गहराई इतनी है कि यह पाठक को सोचने पर मजबूर कर देती है। पटनायक का उद्देश्य स्पष्ट है—शूद्रों को उनकी ऐतिहासिक भूमिका याद दिलाना और उन्हें राजनीतिक सशक्तिकरण की ओर प्रेरित करना।
पुस्तक का मूल थीसिस यह है कि भारत का वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक ढांचा ब्राह्मणवादी वर्चस्व पर टिका है, जो शूद्रों (और व्यापक रूप से बहुजन समाज) को हमेशा से हाशिए पर रखता आया है। पटनायक तर्क देते हैं कि शूद्र न तो हमेशा से निम्न थे, न ही उनका इतिहास सेवा-कर्म तक सीमित। वे प्राचीन काल में क्षत्रिय-जैसे योद्धा और शासक थे, जिन्हें वर्ण-व्यवस्था के माध्यम से दबाया गया। यह विचार डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की पुस्तक "शूद्र कौन थे?" से प्रेरित लगता है, लेकिन पटनायक इसे समकालीन राजनीति से जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि आजादी के बाद भी, आरक्षण और लोकतंत्र के बावजूद, शूद्रों का सशक्तिकरण अधूरा है क्योंकि वे "चमचा युग" (कांशीराम का शब्द) में फंस गए हैं—जहां वे सवर्ण दलों के पिट्ठू बनकर रह गए हैं।
पुस्तक तीन मुख्य भागों में विभाजित है। पहला भाग ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर केंद्रित है, जहां पटनायक ऋग्वेद से लेकर मध्यकाल तक शूद्रों की भूमिका का विश्लेषण करते हैं। वे रामशरण शर्मा की "शूद्रों का प्राचीन इतिहास" का हवाला देते हुए बताते हैं कि शूद्र श्रमिक वर्ग थे, लेकिन आर्थिक रूप से मजबूत। उनका शोषण उच्च वर्गों के साथ संबंधों से उपजा। दूसरा भाग समकालीन राजनीति पर है, जहां पटनायक मंडल आयोग, ओबीसी आरक्षण और बीएसपी के उदय को शूद्र क्रांति के चरण बताते हैं। वे कांशीराम को "बहुजन नायक" के रूप में चित्रित करते हैं, जिन्होंने "तिलक, तराजू और तलवार" को इकट्ठा कर सत्ता की कुंजी हाथ में ले ली। तीसरा भाग भविष्योन्मुखी है—एक "शूद्र भारत" की कल्पना, जहां शिक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीति बहुजन-केंद्रित हो। इस पुस्तक के संपादक अरविंद मोहन है, जो उनकी पत्रिका "सामायिक वार्ता" से जुड़े हुए थे। उनके आलेखों को संकलित कर यह पुस्तक प्रकाशित की गई, जिसकी भूमिका किशन पटनायक ने सन 1995 में लिखी थी। इस पुस्तक में अरविंद मोहन की संपादकीय टिप्पणी
"इस किताब के पच्चीस साल",
किशन पटनायक की भूमिका "लेखक की ओर से" के अतिरिक्त उनके ग्यारह आलेख दो राष्ट्रीय संकट और शूद्र शक्ति का उभार, विश्व का संकट यानी डंकल प्रस्ताव के पीछे क्या है?,
शासक जमात और उसका दर्शन, यह तो प्रतिक्रान्ति है, मुद्राकोष का कर्ज और 'उसका' मन्त्री, आँकड़ों का झूठ और 'आम सहमति' का फरेब, प्रबल आर्थिक राष्ट्रवाद का समाधान , दूसरा महा संकट, बाबरी मस्जिद का ध्वंस, धर्मनिरपेक्षता का घोषणा-पत्र, उभरती शूद्र चेतना की सीमाएँ और 'भारत शूद्रों का होगा' संकलित हैं।
संरचना सरल लेकिन प्रभावी है। प्रत्येक अध्याय छोटे-छोटे उदाहरणों और ऐतिहासिक घटनाओं से समृद्ध है, जैसे पूना पैक्ट का विश्लेषण या 1990 के मंडल विरोध प्रदर्शनों का वर्णन। भाषा सहज हिंदी है, जो ग्रामीण पाठक को भी आकर्षित करती है, लेकिन कभी-कभी बोलचाल की शैली में इतनी सरल हो जाती है कि विद्वतापूर्ण लगे। कुल मिलाकर, यह पुस्तक एक मेनिफेस्टो-सी लगती है, न कि शुष्क शोध ग्रंथ।
एक प्रेरणादायक आह्वान
पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति उसकी प्रासंगिकता है। पटनायक ने शूद्रों को मात्र पीड़ित के रूप में नहीं, बल्कि सशक्तकर्ता के रूप में चित्रित किया है। वे तर्क देते हैं कि भारत की 85% आबादी बहुजन है—दलित, ओबीसी, आदिवासी—और यदि वे एकजुट हों, तो सत्ता उनके हाथ में होगी। यह विचार कांशीराम के "बहुजन समाज" के सिद्धांत से मेल खाता है, लेकिन पटनायक इसे और विस्तार देते हैं। उदाहरणस्वरूप, वे उत्तर प्रदेश में बीएसपी की सफलता को शूद्र उभार का प्रमाण बताते हैं, जहां मायावती जैसे नेता सत्ता तक पहुंचे। यह आशावादी दृष्टिकोण पाठक को उत्साहित करता है, खासकर उन युवाओं को जो जातिगत भेदभाव से जूझ रहे हैं।
दूसरी शक्ति है ऐतिहासिक विश्लेषण की तटस्थता। पटनायक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर स्रोतों का उपयोग करते हैं—अम्बेडकर,और यहां तक कि मार्क्सवादी इतिहासकारों से। वे बताते हैं कि वर्ण-व्यवस्था कर्म-आधारित थी, लेकिन बाद में जन्म-आधारित हो गई, जिससे शूद्रों का पतन हुआ। यह विवेचना न केवल शैक्षिक है, बल्कि राजनीतिक जागृति का माध्यम भी। पुस्तक में उदाहरण जैसे जयप्रकाश नारायण का "संपूर्ण क्रांति" नारा, जो शूद्रों के लिए अपूर्ण रहा, पाठक को सोचने पर विवश करता है।
यह मात्र सिद्धांत नहीं, बल्कि कार्य-योजना प्रस्तुत करती है—शूद्रों को संगठित होने, शिक्षा ग्रहण करने और वोट की ताकत समझने का आह्वान। समकालीन संदर्भ में, जब ओबीसी आरक्षण पर बहस छिड़ी हुई है, यह पुस्तक एक ताजा हवा का झोंका है। यह शूद्रों को "उत्पादक जातियों" के रूप में देखने की प्रेरणा देती है, जैसा कि हाल की "शूद्र: एक नये पथ की परिकल्पना" (आकाश सिंह राठौर संपादित) में चर्चा हुई है। कुल मिलाकर, यह पुस्तक बहुजन आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान करती है।
"भारत शूद्रों का होगा" एक ऐसी पुस्तक है जो समय की मांग पर खरी उतरती है। किशन पटनायक ने इसे एक राजनीतिक हथियार के रूप में गढ़ा है, जो शूद्रों को उनकी खोई हुई गरिमा लौटाने का संदेश देती है। यह अम्बेडकर, कांशीराम और फुले के विचारों का संश्लेषण है, लेकिन पटनायक की अपनी आवाज के साथ। आज, जब जाति आधारित राजनीति चरम पर है—उत्तर प्रदेश से बिहार तक—यह पुस्तक बहुजन युवाओं के लिए एक मार्गदर्शक हो सकती है। हालांकि, इसकी कमजोरियां इसे एक पूर्ण इतिहास ग्रंथ से दूर रखती हैं, लेकिन प्रेरणा के स्रोत के रूप में यह अमूल्य है।
यदि आप बहुजन समाज के उत्थान में रुचि रखते हैं, तो यह पुस्तक अवश्य पढ़ें। यह न केवल इतिहास पढ़ाती है, बल्कि भविष्य रचने की प्रेरणा भी देती है। पटनायक का संदेश स्पष्ट है: शूद्रों का भारत ही असली भारत होगा—एक समतामूलक, न्यायपूर्ण समाज। यह पुस्तक बहस छेड़ने वाली है, और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत।