एक सच्ची पौराणिक एतिहासिक कहानी महाराजा घूरदेव की एवं उत्तराखंड गढ़वाल का संक्षिप्त इतिहास
The story of Maharaja Ghoordev uttarakhand
एक सच्ची पौराणिक एतिहासिक कहानी महाराजा घूरदेव की उत्तराखंड
घुरदौड़ा वंश के वंश शिरोमणि राजा घूरदेव की कहानी उत्तराखंड की पौराणिक कथा कहानियों मैं एवम व लोक जगरों मैं सुनने को मिलती है उत्तराखंड मैं । उत्तराखंड के गढ़वाल के 52 गढ़ों का इतिहास मैं भी उल्लेख मिलता हैं. यह कहानी सातवीं सताब्दी की है जब राजा घूरदेव धार नगरी मैसना गुजरात से उत्तराखंड पधारे। इसी समय के अंतराल मैं अनेक राजा राजस्थान से भी उत्तराखंड आए । मध्य हिमालय मैं इसी समय कई राजनैतिक परिवर्तन हुवे। कई शासकों ने मध्य हिमालय के इस क्षेत्र में अपना शासन चलाया और जोशीमठ को राजधानी बनाया । इनमें कैनतुरा शासकों ने भी केदारखंड से कुरमाञ्चल तक अपना शासन चलाया ,और फिर वे केदारखंड को छोड़कर कुरमाञ्चल चले गए। महाराजा घूरदेव सबसे पहले चांदपुर मैं अपनी रानी के साथ आए राजा घूरदेव ने कैनतुरा राजवंश से दूसरी शादी की उनकी दूसरी रानी का नाम सुंदरा था । राजा की पहली रानी के देहांत के बाद राजा ने चांदपुर को छोड़ दिया और पौड़ी जिला के पाबौ ब्लॉक में चमपेश्वर महादेव मंदिर के नजदीक एक मजबूत किला बनाया जिसका नाम अपनी रानी सुंदरा के नाम से सुंदरगढ़ रखा। राजा घूरदेव एक महान वीर था अपनी सेना के साथ राजा ने इस क्षेत्र में मांडाखाल से पिनगड दमदेवल तक लगभग 50/60 किलोमीटर मैं ,जो पहाड़ी क्षेत्र में काफी लंबा माना जाता है ,अपना राज्य फैलाया। राजा ने इसके अलावा बिदोलगड़ पाबौ चोपड़ा पाली क्षेत्र का भी प्रतिनिधित्व किया । राजा के नजदीकी गाँव धारकोट ,पीपली,सन्यू ,मारखोला ,ईठुड़ ,ताल,सिवाल ,उकाल ,चरगड़ ,किमखोली,जबरोली,पिनानी इत्यादि गाँव रहे। राजा के तीन पुत्र हुवे । इसी प्रकार उत्तराखंड गढ़वाल क्षेत्र में 52 गढ़ों का निर्माण हुआ और गढ़वाल 52 गढ़ों का देश कहलाने लगा ये राजा ओ वीर थे जिन्होंने कभी दूसरे की गुलामी पसंद नहीं की कर्मठ थे ,मेहनती थे अपने किले और दुर्ग बनाए और शान से शासन चलाया।
अगले भाग में राजा जी की कहानी का अगला भाग बताएंगे अगर आपको कहानी अच्छी लगी रोचक लगी
जय श्री राम जय श्री गायवाले हनुमानजी.