देश में सांप्रदायिक ‘हवाओं की दस्तक’ उजागर करती अनुराग चतुर्वेदी की कृति  समीक्षक: दिनेश कुमार माली

देश में सांप्रदायिक ‘हवाओं की दस्तक’ उजागर करती अनुराग चतुर्वेदी की कृति   समीक्षक: दिनेश कुमार माली

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 देश में सांप्रदायिक ‘हवाओं की दस्तक’ उजागर करती अनुराग चतुर्वेदी की कृति 

समीक्षक: दिनेश कुमार माली

तालचेर, ओड़िशा

राजस्थान के उदयपुर में 11 जून 1954 को जन्मे अनुराग चतुर्वेदी का नाम हिंदी पत्रकारिता के उन चुनिंदा पत्रकारों में से हैं, जिन्होंने न केवल खबरें लिखीं, बल्कि खबरों के पीछे की ज़िंदगी को भी जीया और दर्ज किया। जेएनयू से समाज शास्त्र में एमए और राजस्थान विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद लंबे समय तक पत्रकारिता में सक्रिय रहे। ‘धर्मयुग’ (मुंबई),’ रविवार’ (कोलकाता) ‘संडे ऑब्जर्वर’ (हिन्दी, मुंबई), ‘बीबीसी रेडियो’ (हिन्दी) के लिए मुंबई से स्ट्रिंगर और ‘हमारा महानगर’ (सांध्य दैनिक, मुंबई) के संपादकीय विभाग का लंबा सफर – यह सब उनकी नई पुस्तक हवाओं की दस्तक (राजकमल प्रकाशन, 2023, मूल्य: 350 रुपये, पेपरबैक, 256 पृष्ठ) में समाहित है। उन्हें महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी और केंद्रीय सेंसर बोर्ड के सदस्य भी बनाया गया। यह रचना कोई औपचारिक आत्मकथा नहीं, बल्कि एक संस्मरण-शृंखला है, जिसमें छोटे-छोटे अध्याय हवाओं की तरह बहते हैं – कभी कोमल, कभी तूफानी, कभी सुगंधित, कभी धूल भरी। इस पुस्तक में 44 छोटे अध्याय हैं (क्रम में 11 से 253 पृष्ठ तक), प्रत्येक 3-7 पृष्ठ का। यह संरचना जानबूझकर चुनी गई है – फ्लैशबैक की तरह, जैसे कोई पुरानी डायरी के पन्ने पलट रहा हो। कोई सख्त कालानुक्रम नहीं, बल्कि भावनात्मक और थीमैटिक क्रम है।

गांधी, लोहिया और जयप्रकाश के विचारों की दुनिया से प्रेरित पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी जी राजस्थान के उदयपुर से पहले दिल्ली, फिर मुंबई और फिर कोलकाता, राची में पहुंचता है तो देखता है कि आज़ादी के बाद की हिंदी पत्रकारिता अंतिम सांसें ले रही है और उसकी जगह कॉरपोरेट पत्रकारिता सुरसा जैसे मुंह फाड़े सामने खड़ी है। अपनी संवेदनशील अनुभूतियों को उन्होंने अपनी इस कृति में उतारा है, जिसका शीर्षक है ‘हवाओं की दस्तक’, जो प्रतीकात्मक और बहुआयामी है। हवाओं की दस्तक केवल एक पुस्तक नहीं, एक युग का दर्पण है। इस कृति में अनुराग चतुर्वेदी ने न केवल अपनी कहानी लिखी, बल्कि हिंदी पत्रकारिता की आत्मा को कैद किया। यह पुस्तक नई पीढ़ी के पत्रकारों, छात्रों, और सामाजिक चेतना रखने वाले हर पाठक के लिए अनिवार्य पठन है। “हवाएँ बदलती हैं, लेकिन दस्तक देती रहती हैं।” यह दस्तक आज भी सुनाई देती है गृहयुद्ध की। हिन्दू-मुस्लिम, गरीब-धनी और समाज में फैलती खाई आदि के कारण। बचने का एक ही उपाय है, सवाल उठाने की, सच लिखने की, और ज़िंदगी को पूरी तरह जीने की। हवाएँ आती हैं, दस्तक देती हैं, बदलाव की सूचना देती हैं, और चली जाती हैं। ठीक वैसे ही, चतुर्वेदी की ज़िंदगी में आए लोग, घटनाएँ, दौर – सब हवाएँ हैं। कोई ठहर गया, कोई उड़ गया, लेकिन सबने एक निशान छोड़ा। हिंदी पत्रकारिता, समाजवाद और बदलते भारत के बीच एक पत्रकार की यह आत्मकथात्मक यात्रा उस दौर की साक्षी है जब अख़बार बिक रहे थे और ईमान भी। ‘हवाओं की दस्तक’ स्मृति, संघर्ष और स्वप्नभंग के बीच लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखने की ज़िद की कहानी है। इस पुस्तक में परिवार, दोस्ती, प्रेम, राजनीति, बॉलीवुड, मंडल आयोग, इमरजेंसी, उदारीकरण, और सबसे ऊपर – पत्रकारिता की आत्मा का ह्रास – सब कुछ समाया है। वरिष्ठ पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी अपनी हालिया पुस्तक ‘हवाओं की दस्तक’ के अंतिम अध्याय में जिस आहट का संकेत कर रहे हैं वे शक्तियाँ दुनियाभर में आज अपना असर दिखा रही है. यह संस्मरणात्मक पुस्तक झीलों की नगरी उदयपुर में फतहसागर के किनारे बचपन और कैशोर्य व्यतीत करने वाले पत्रकार की जेएनयू, दिल्ली, अरब सागर के तट पर सपनों की नगरी मुंबई को अपना बनाने की कथा है।

इस संकलन में लेखक ने अपनी ग्रामीण जड़ें, जेएनयू और छात्र राजनीति, पत्रकारिता की शुरुआत (जनसत्ता), बॉम्बे-दिल्ली का मीडिया चक्रव्यूह, ऐतिहासिक मोड़ (मंडल, बाबरी, उदारीकरण), व्यक्तिगत संबंध और प्रेम आधारित आलेखों का संकलन है। इस पुस्तक के प्रमुख पात्रों में लेखक अनुराग चतुर्वेदी ईमानदार, जिज्ञासु प्रवृत्ति के है, कभी-कभी असमंजस में पड़ जाते है। उनके पिता नंद बाबू अपने परिवार के सुगंधित वृक्ष, जो भारतीय पारिवारिक परंपरा के प्रतीक है। उनकी माँ स्मृतियों में बसी हुई है, मगर अनकही ढंग से। इसके अतिरिक्त ज्योति, कुणाल, मिथिलेश, प्रभा आदि दोस्तों का भी जिक्र आता है। राजेश खन्ना, बाल ठाकरे, धर्मवीर भारती, नीतीश कुमार जैसी वास्तविक हस्तियाँ के किस्सों से यह कृति जीवंत हो उठती है। एक नए भारत के निर्माण के साझे सपने को सच करने के लिए यह युवा पत्रकारिता, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय होता है। प्रौढ़ होते-होते किशोर सपने दरकने लगते हैं। वैयक्तिक सफलताओं के बावजू़द देश और दुनिया का आशा के विपरीत दिशा में बदलते जाना और उससे उपजी निराशा झलकने लगती है। समाज उस दौर में पहुंच रहा है, जहां वो स्मृति-विहीन किया जा रहा है। निजीकरण, वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं बीच ध्रुवीकृत समाज बनने लगा है। बीस वर्ष में देखते-देखते पुरानी दुनिया इतनी तेजी से बदली कि नागरिक अधिकार, मज़दूर आंदोलन और मनुष्य की गरिमा ही नष्ट होती नज़र आने लगी।  

इस पुस्तक की भूमिका “अपने विरुद्ध लड़ते हुए” में लेखक अनुराग चतुर्वेदी अपनी आंतरिक लड़ाई – शहर की चकाचौंध और गाँव की मिट्टी के बीच का उल्लेख करते है। जो उनके पहले वाक्य: “मैं अपने ही खिलाफ लड़ रहा था – यह लड़ाई कोई नई नहीं थी।” से स्पष्ट होता है। इस पुस्तक में तीन भाग हैं।

1॰ *झीलों की हथेली पर सोया शहर :-* 

पहला खंड ‘झीलों की हथेली पर सोया शहर’ बड़ा रोचक और प्रामाणिक दस्तावेज़ है। यह शहर और कोई नहीं उदयपुर है, जिसमें राजनैतिक चेतना का अभाव है। इस खंड के अंतर्गत अनेक छोटे-छोटे अध्याय है। जैसे “नंद बाबू: परिवार के सुगंध वृक्ष” में पिता के चरित्र और उन्हें एक सुगंधित पेड़ की तरह दर्शाया है, जिसकी जड़ें गहरी है, शाखाएँ फैलीं हुई, लेकिन विद्रूपताओं की आंधी में डगमगाने लगते है। “छोटे घर, बड़ा मन” में गरीबी में भी उदारता का वर्णन है कि किस तरह पड़ोसी की बेटी की शादी में पूरा गाँव जाता था और कृष्ण जन्माष्टमी जैसे सांस्कृतिक उत्सव में बच्चे कृष्ण बनते हैं, मटकी फूटती है। लोक संस्कृति का जीवंत दस्तावेज। “पिता, शिक्षक और प्रतिबद्ध कद्दावर कवि” में गाँव के स्कूल मास्टर और अपने पिता द्वारा शिक्षा को मिशन की तरह लेने के साथ-साथ वर्तमान शिक्षा से तुलना की गई है। “बी.बी.सी.: फिल्मी पापाजी” में मीडिया पर पहला व्यंग्य कसा है। इसके अतिरिक्त, यह खंड अपने नाना के परिवार,माँ के मायके, बड़े भाई अरुण दादा, अपने भाई-बहिन सुयश,मंजु और आदर्श, परिवार की ज़िम्मेदारी उठाने वाले मिथिलेश जी,प्रभा जी, पत्रकारिता और चुनावी अखाड़े के पहले सबक सीखने के साथ-साथ अपने जीवन के नए साथी और अपने वजूद की तलाश पर केन्द्रित हैं।

“जे.एन.यू.: पढ़ाई और राजनीति” अध्याय में वे लिखते है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र राजनीति के लिए यूँ ही विख्यात नहीं में रहा। जे.एन.यू. में छात्र संघ का जो भी अध्यक्ष हुआ वो आजीवन राजनीति गढ़ रहा और उनमें से कई नेता हमारे समय के देश के पटल पर छा गए। इनमें प्रकाश करात, आनन्द कुमार, देवीप्रसाद त्रिपाठी और सीताराम येचुरी प्रमुख हैं। उस समय आई.ए.एस. यानी भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा देनेवाले छात्र बहुत कम होते थे इसके अलावा जो विदेश जाने के लिए जीमेट की परीक्षा देते थे वे भी कम होते थे और थोडी ग्लानि से भी भरे होते थे। जेएनयू में उस समय कैफ़ी आज़मी, भूपेन हजारिका, नोम चोम्स्की और किशन पटनायक जैसे ख्यातनाम लोग मेस में आकर अपने भाषण देते थे।

अनुराग चतुर्वेदी ने उदयपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी माध्यम से परीक्षा पास की थी, पर जेएनयू में सब-कुछ अंग्रेजी में था। इसलिए उन्हें गैर-अकादमिक कार्य अधिक रुचिकर लगने लगे। कुछ महीनों बाद वे जे.पी॰ आन्दोलन में काफ़ी सक्रिय हो गए और दिल्ली के समाजवादी युवजनों जैसे राजकुमार जैन, विजय प्रताप, रमाशंकर, सुधीन्द्र भदौरिया आदि से जुड़ गए। तत्कालीन उदयपुर में पत्रकारिता के हिसाब से कोई क्रान्तिकारी जगह नहीं रही है। वर्ष 1971 में जय राजस्थान दैनिक का प्रकाशन शुरू हुआ और 1973 के 6 अक्तूबर को उदयपुर एक्सप्रेस शुरू हुआ, लेकिन यह सत्य है की राजस्थान के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों मोहनलाल सुखाड़िया और भैरोसिंह शेखावत छोटे अख़बारों को अहमियत देते थे, उन्हें पढ़ते थे ताकि वे जनता की तकलीफ़ और विपक्ष से सहानुभूति रखनेवाले अख़बार ख़बरों से अवगत होते थे। उदयपुर के बारे में वे लिखते हैं:-

“ उदयपुर तब शानदार साहित्यकारों से रोशन रहता था, चेतक चौराहा कहलाता था, सर्किल नहीं बना था। शराब की दुकानें भी नहीं थीं, लन्दन स्टोर में बीयर मिलती थी जहाँ जाने में लोग इधर-उधर देखते थे। तोडावत पान की दुकान पर रेही को नन्द बाबू के अलावा ओंकार श्री (जो बाद में ओशो सम्प्रदाय से जुड़ गए और उनके प्रभाव में आ गए), मुम्बई की फ़िल्मनगरी से जुड़े और 'चल संन्यासी मन्दिर में' जैसे गीत लिखनेवाले विश्वेश्वर शर्मा, हिन्दी प्राध्यापक और नन्द बाबू के साथ सप्तकिरण के सम्पादक रहे प्रकाश आतुर, शान्तिलाल भारद्वाज 'राकेश' और के. के. वशिष्ठ मिलते थे।”

उदयपुर में आपातकाल के हटने की खबर पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कराते हुए वे लिखते हैं, “ न जाने किस राजनीतिक गणित के चलते इन्दिरा गांधी ने न केवल आपातकाल हटाया बल्कि चुनाव भी घोषित किये और कुछ राजनीतिक क़ैदी रिहा कर दिये। बीमार जे.पी. भी रिहा हो गए। उनकी राजनीतिक सूझ-बूझ के चलते भारतीय जनसंघ, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस (संगठन) और जगजीवन राम की कांग्रेस फ़ॉर डेमोक्रेसी और चरण सिंह की पार्टी लोकदल का विलय हुआ और जनता पार्टी बनी। मार्च 1977 में लोकसभा के चुनाव हुए थे। जयप्रकाश नारायण जनता पार्टी के प्रणेता थे, लेकिन उन्होंने पहले से ही तय कर लिया था कि वे कोई पद नहीं लेंगे। जनता पार्टी ने किसी एक नेता को आगे रखकर चुनाव नहीं लड़ा था। जनता पार्टी जब उदयपुर से चुनाव लड़ी तो मुक़ाबला कांग्रेस के कालूलाल श्रीमाली और पुराने जनसंघी भानुकुमार शास्त्री के बीच हुआ। भानुकुमार शास्त्री की चुनावी सभाओं में नन्द बाबू ने कई भाषण दिये और वे अपनी पुरानी फ़ॉर्म में थे।”

इस अध्याय में लेखक ने पार्टी रूपी इस कुनबे के मोरारजी देसाई, मधु लिमये, राजनारायण, जॉर्ज फ़र्नांडीस और मधु दंडवते, बाबू जगजीवन राम, हेमवती नन्दन बहुगुणा, चौधरी चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, नानाजी देशमुख आदि को याद भी किया है। यही नहीं, लोहिया साहित्य को सम्पूर्ण तरीक़े से पढ़ने और अच्छा भाषण देने के कारण सिरोही जिले के मूल निवासी विज्ञान मोदी समाजवादियों में जाने जाने लगे थे। उसी तरह उदयपुर के जमनालाल दशोरा और नन्द बाबू, भाई भगवान और मावली से मोतीलाल कुली। बाद में विज्ञान मोदी भैरोसिंह शेखावत के मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री बन पाए। उन्हें शिक्षा, जेल और स्वायत्त शासन विभाग का जिम्मा मिला।

अपने ससुराल के परिवारे बारे में जिक्र करते हुए अनुराग चतुर्वेदी लिखते है कि, “ क्षमा का परिवार बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में पत्थर का व्यापार करने राजस्थान के हिंडौन शहर को छोड़कर दिल्ली आ गया था। चौबे अमरचन्द और उनके भाई राधावल्लभ चौबे वणिक बुद्धि के थे। जबकि अमरचन्द जी के पुत्र गिरिराज किशोर भावुक थे वे एक भाई और बहन थे। बहन का नाम विद्यावती था। गिरिराज किशोर दिल्ली की रईसों की बस्ती सीताराम बाज़ार में रह पिता का व्यवसाय करने लगे। 1953 में गिरिराज जी के पिता अमरचन्द जी का निधन हो गया। गिरिराज जी का विवाह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ के पास दानपुर में हुआ। पत्नी का नाम था धन्ती देवी था, जिनके तीन बहन और एक भाई थे।”

उनके ससुराल वालों को संस्कृत, अंग्रेजी में महारत हासिल थी, यहाँ तक कि मिथिलेश जी (क्षमा के बड़े भाई) ने बहुत कम उम्र में देश के तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के सामने गीता सुनाई और पुरस्कार हासिल किया। 1956-57 में उनके ससुराल को एक नई सम्पन्नता मिली। उनके ब्रिटिश डर्बी जैकपॉट निकला। जिसका घोड़े पर दाँव लगाया गया था, जिसने ब्रिटेन की महारानी के घोड़े को भी पीछे छोड़ दिया था। इस एवज में उन्हें काफी धन मिला। जिससे रूपनगर में राजस्थान के पूर्व राज्यपाल गुरुमुख निहाल सिंह की कोठी 5/13 खरीदी, गाड़ी खरीदी और दिल्ली को ही अपना स्थायी निवास बनाया और कभी हिंडौन वापस नहीं जाने की सोची।

लेखक की बारात में अपने कवि पिता नन्द बाबू के मित्र स्वरूपसिंह दसौधी, मैकफ़ारलैंड साहब, माथुर साहब, दिल्ली के डॉक्टर के. एल. शर्मा (समाजशास्त्री), भूपेन्द्र नागला के अतिरिक्त समाजवादियों नेताओं में जॉर्ज फ़र्नांडिस और उनकी पत्नी लैला, मधु लिमये, सुरेन्द्र मोहन, लाडली मोहन निगम, अरुणा पुरोहित (चित्रकार) और प्रोफ़ेसर योगेश अटल भी आए थे। बाद में उनके पत्रकारिता में आने के बाद देश के नमी गिरामी नेताओं से संपर्क होने लगा।

2॰ *कुर्ला से कोलावा :-* 

इस खंड में लेखक ने आगत की अनिश्चितता, मीडिया का चक्रव्यूह: बॉम्बे-दिल्ली, महानगर-पत्रकारिता का नया मॉडल, संडे ऑब्जर्वर: पूँजी का नया दौर, पूँजीवाद का मीडिया पर कब्जा, बाल ठाकरे: एक जिद्दी जो उदार बन गए, बॉम्बे हॉस्पिटल: जीवन बचाने की जद्दोजहद, सेंसर बोर्ड: एक नई फिल्मी दुनिया, सत्या’ फिल्म की सेंसर लड़ाई, अनिल अंबानी: मीडिया पर कब्जे का सपना, कॉर्पोरेट का मीडिया अधिग्रहण, राजेश खन्ना: हवा में उड़ते सवाल, देवसाहब: मुकदमा और उदारता, कोलाबा से वापसी आदि अनेक विचारोत्तेजक आलेख लिखे हैं। इसके अतिरिक्त, इस खंड में देश के प्रतिष्ठित अन्य पत्रकारों जैसे गणेश मंत्री, हरिवंश, जितेंद्र आर्य, जयदेव, डॉ उषा पारीख, रामदास, सतीश अग्निहोत्री, विश्वनाथ सचदेव, इंशा,कमल कान्त पाठक आदि के साथ अपने सम्बन्धों का उल्लेख किया है।

समाजवादी सपने के साथ मुंबई पहुंचे किशोर ने धर्मवीर भारती के संस्थान में पत्रकारिता सीखी। पूंजीवादी दुनिया से समाजवादी सपने की लड़ाई देश की आज़ादी के संघर्ष के समय से ही चली आ रही थी। पत्रकारिता भी इस लड़ाई का एक मोर्चा था। कोलाबा और कुर्ला, एक ही मुंबई के दो हिस्से, एक स्वप्न, एक दुःस्वप्न. किशोर युवा हुआ. ‘कुर्ला से कोलाबा’ पहुंच गया। वैयक्तिक सपने पूरे हुए, दुनिया बदलने का सामूहिक स्वप्न और दूर चला गया।

पिछली सदी के अंतिम दशकों में दुनिया बदली, देश भी बदला। इस पत्रकार ने देखा कि ‘मुंबई से लेकर दिल्ली तक सारे शहरों के चेहरे बदल गए। चमकदार शहरों के बीच अंधेरी झोपड़ियां बेबस हो गईं। पत्रकारिता धीरे-धीरे मनोरंजन में बदल गई और मीडिया एक उद्योग में तब्दील हो गया…राजनीति और मनोरंजन एक-से लगने लगे। बड़े-बड़े समाचार पत्र और पत्रिकाएं कॉरपोरेट के दबाव में बंद हो गईं या अप्रासंगिक हो गईं। ‘एक दशक में वे सब अख़बार बंद हो गए, जो नई भाषा रच जन-संघर्षों को मज़बूती देते थे….. अब बाज़ार की शक्तियां ही समाज की गति तय करने लगीं।’

इस दौरान धर्मनिरपेक्षता का पैरोकार अख़बार सांप्रदायिक शक्तियों के हाथों में चला गया। देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब और हिंदू-मुस्लिम भाईचारा देखते-देखते समाप्त होने लगा और इस सबमें कॉरपोरेट पूंजी से नियंत्रित अख़बार उत्साह से योग देने लगे। संपादकीय संस्था अप्रासंगिक हो गई। देश और दुनिया में आ रहे इन आमूल बदलावों को समझने के लिए धर्मयुग, रविवार और महानगर के संपादकीय विभाग से जुड़े पत्रकार की एक प्रामाणिक इनसाइडर-स्टोरी के रूप में ‘हवाओं की दस्तक’ को पढ़ा जाना चाहिए. पत्रकारिता, राजनीति और फिल्म-जगत् की कई चर्चित हस्तियों के खूबसूरत पोर्ट्रेट इस पुस्तक और रोचक बनाते हैं. पक्ष स्पष्ट है लेखक का, लेकिन किसी व्यक्ति के प्रति कहीं द्वेष या पूर्वाग्रह नहीं है. एक पत्रकार की तटस्थता सर्वत्र है. भाषा में निर्लिप्त सहजता है. फतहसागर से अरब सागर तक, यह एक व्यक्ति की यात्रा नहीं हैं. पूरे देश की यात्रा है.

‘यह कहानी खोने के दर्द से जुड़ी है। धर्मयुग, रविवार और महानगर खो गए। हिंदी की जगह नहीं रही। समाजवाद नहीं रहा…सत्ता अपने क्रूर रूप में प्रकट हुई और देश के नागरिक धर्म और एक व्यक्ति को लेकर सम्बन्ध तोड़ने और जोड़ने लगे.’ यह शोध करना होगा कि क्यों और कैसे हिंदीभाषी समाज इतना सांप्रदायिक हो गया है।

वागले का ‘महानगर’ किस तरह बंद हुआ ? उस पर आलोकपात करते हुए वे लिखते हैं कि “वे ‘महानगर’ की बिक्री और उसके विज्ञापनों मे मिलने वाले राजस्व के कारण बहुत हद तक आत्मनिर्भर थे। इस तरह वे कुछ वर्ष तक चल पाए। लेकिन नौबत ऐसी भी आई कि घर गिरवी रखना पड़ा, बैंकों ने और धन देना रोक दिया तो उनके सामने बड़ा आर्थिक संकट आ गया। तब वे समाजवादी विचारों वाली कई ट्रेड यूनियनों के पास गए। सभी ने मीठी-मीठी और बड़ी-बड़ी बातें कीं पर सिर्फ़ शान्ति भाई पटेल की तरफ़ से पच्चीस हज़ार की मदद के अलावा किसी ने कुछ नहीं दिया। लोगों से ग्राहक बन चन्दा देने की अपील भी पाँच-छह लाख रुपये ही जुटा पाई। विकल्प कम होते गए और महानगर बेचने की नौबत आ गई। सकाल (जिसे शरद पवार का परिवार चलाता है) ने कहा, अगर निखिल आते हैं तो वे तैयार हैं पर निखिल ने आत्माहीन अखबार का जिम्मा लेने से साफ़ मना कर दिया।”

उधर मुझे मुम्बई दंगे और बाबरी मस्जिद गिराए जाने से हिन्दू-मुस्लिमों के बीच दूरियाँ बनीं और साम्प्रदायिक प्रेत खड़ा हो गया। मुम्बई हिंसा की चपेट में आ गई। ‘महानगर’ के सामने कई चुनौतियाँ थीं। उनके प्रतिद्वंद्वी सिर्फ़ साम्प्रदायिक रिपोर्टिंग कर रहे थे। इस तरह इस अखबार की असामयिक मौत हो गई।  

बाल ठाकरे के साथ लेखक अनुराग चतुर्वेदी इंटरव्यू को याद करते हुए वे दृष्टांत देते है कि “जैसे ही मैंने सवालों की सूची निकाली, तभी बाल ठाकरे बोले, यह इंटरव्यू तो संडे के लिए है न? मैंने कहा, "यह रविवार के लिए है।"

बाल ठाकरे ने पूछा, "उसका सम्पादक कौन है?"

मैंने जवाब दिया, "उदयन शर्मा।"

बाल ठाकरे ने फिर सवाल पूछा, "क्या एम.जे. अकबर हैं वहाँ?"

मैंने जवाब दिया, "वे हमारे ग्रुप एडिटर हैं।" अकबर साहब का रुतबा बढ़ाने के खयाल से मैंने कहा, "उनका नाम सभी प्रकाशनों में छपता है, रविवार में भी।"

"अच्छा, यह बात है।" ठाकरे साहब का थोड़ा आश्चर्य-भरा जवाब था। वे सिगार जला चुके थे। काफ़ी भगवा वस्त्र धारण किये हुए थे। बोले, "मैं मुस्लिम सम्पादकों की मैगजीन के लिए इंटरव्यू नहीं देता।"

बात बिगड़ चुकी थी। उसे पटरी पर लाने के लिए उन्होंने अपने लिंक महाराष्ट्र से जोड़ते हुए कहा कि मेरी माँ महाराष्ट्र की हैं और हम लोग मथुरा से खानदेश शिवाजी महाराज के कारण आए। यह कहानी क़रीब पाँच सौ साल पुरानी है। इसकी कोई ऐतिहासिकता तो नहीं है पर यह हम चतुर्वेदियों की परम्परा का हिस्सा बन गया है। हमारे पुरखों ने आगरा के क्रिले से बाहर निकले शिवाजी महाराज और उनके बेटे संभाजी को सुरक्षित रूप से रायगढ़ पहुँचाया। मथुरा से रायगढ़ की यात्रा में मथुरा के चौबे शिवाजी के साथ रहे और इसका बदला मुग़ल राजा ने सामूहिक नरसंहार से लिया। यह जलियाँवाला बाग़ नरसंहार से भी बड़ा हत्याकांड था। हजारों चतुर्वेदी मारे गए। फिर भी शिवाजी का साथ नहीं छोड़ा। वे चितौड़गढ़ के रास्ते महाराष्ट्र गए। कई परिवार बेड़च नदी के किनारे पीपली गाँव में रहने लगे। मिसरों की पीपली में हमारी दादी रहती थीं। हमारे बाबा उदासी सम्प्रदाय के सदस्य थे और 32 साल की उम्र में गृहस्थ बने। वे हाड़ौती क्षेत्र के झालावाड़ रियासत के मुलाजिम थे। हमारे नाना के पुरखों को शिवाजी महाराज ने खानदेश के जलगाँव में बसाया। वे नसीराबाद में बसे जहाँ मेरे पिता ने पहले इंग्लिश हाई स्कूल के प्रिंसिपल का पद 21 वर्ष की उम्र में सँभाला। आज भी जब चतुर्वेदी बारात आती है तो जब बारातियों को भोजन कराया जाता है तो 'मुग़ल पसारे' जाते हैं। जहाँ बारात बैठती है उस जगह आटे से मुगलों की शक्लें उकेरी जाती हैं, जिसका आशय होता है, 'मुगलो, हम तुमसे इतनी नफ़रत करते हैं कि इस आनन्द के दिन भी हम तुम्हारी क़ब्र पर बैठकर यह आनन्द उत्सव मना रहे हैं।' यह है नरसंहार के खिलाफ़ संस्कृतियों का प्रतिरोध। हम तो पीड़ित लोग हैं। हमें तो सताया गया था। अब आप ही न्याय कीजिए कि क्या आप मुझे इंटरव्यू देंगे या नहीं?” यह सुन बाल ठाकरे का दिल पसीज गया। बोले, "जो पूछना है। पूछो।"

टी.वी. आने के शुरुआती दिनों में भारत का मध्य वर्ग धीरे-धीरे बढ़ रहा था और संयुक्त परिवार टूटने लगे थे। उस समय धर्मवीर भारती ने समय को पहचानते हुए अनेक नये लेखकों और कवियों, अनजाने शहरों के उभरते लेखकों को हिन्दी साहित्य की दुनिया में लाए और उन्हें स्थापित किया। मगर वे तय काम तय समय पर पूरा न होने पर वे उप-सम्पादक को मानसिक रूप से इतना प्रताड़ित करते थे कि कई बार वह गहरे अवसाद में चला जाता था। यह उनका श्याम पक्ष था। मगर लेखक उन्हें उदारमना मानते है क्योंकि उन्होंने उनके जीवन को व्यवस्थित करने की भरपूर कोशिश की। और उनके गुणों के बारे में लिखते हैं कि , “ वे साथ काम करनेवालों अन्य सहयोगियों के बारे में भी पूरी जानकारी रखते थे। बहुधा तो धर्मयुग का प्रतिस्पर्धी धर्मयुग ही होता था क्योंकि वो शिखर पर होता था। वर्षों शिखर पर बैठना भारती जी को आता था और भाता भी था। भारती जी राजनेताओं से लिखवाने के लिए भी मशहूर थे। लाडलीमोहन निगम, सुरेन्द्र मोहन, अटलबिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के लेख भी धर्मयुग में आते थे। वे भारत की आत्मा को पहचानते थे। इसीलिए भारत की विविधता को धर्मयुग में स्थान देते थे। वे न केवल उत्सव-प्रेमी थे बल्कि भारत की भाषा, वहाँ के बदल रहे स्थापत्य पर चर्चा करते थे। वे भारतीय भाषाओं के लेखन को हिन्दी में लेकर आए और मराठी लेखक गंगाधर गाडगिल की नवल कथा भी छापने से नहीं हिचकिचाए। उन्होंने असम से लेकर महाराष्ट्र तक के प्रमुख लेखकों का परिचय हिन्दी के पाठकों से करवाया। भारती जी इलाहाबाद की मेधा के प्रतिनिधि थे। वे भारत को समझनेवाले समाजशास्त्री थे। ज्ञानी थे। वे अपने सहयोगियों को जिम्मेदारी देते थे और उन पर विश्वास भी करते थे। धर्मयुग के लेखक के समय में योगेन्द्र कुमार लल्ला, मनमोहन सरल और गणेश मंत्री उनके विश्वस्त सहयोगी थे। इनके परामर्श को वे स्वीकार करते थे और कई मायने में लोकतांत्रिक थे। वे जिस विषय में दखल नहीं रखते थे वहाँ अपने सहयोगी को पूरी आज़ादी और श्रेय देते थे। क्रिकेट विशेषांक जिन्हें राजन गांधी निकालते थे पूर्ण रूप से स्वतंत्र थे अपने लेखक और विषय चुनने के लिए। यहीं डॉक्टर भारती एक बड़े सम्पादक बनते हैं।डॉक्टर भारती सही अर्थों में कुम्हार थे। उनके सामने मिट्टी रूपी उप-सम्पादक आते थे तो किसी को वे मटका बना देते तो किसी को दीया। वे पारखी थे। वे उप-सम्पादकों की गति पहचान लेते थे और उससे उसकी चाल तय करते थे।”

वे अपने पत्रकार मित्र हरिवंश के बारे में इस पुस्तक में कई जगह उल्लेख कर चुके हैं। उन्हें याद करते हुए वे लिखते है कि , “प्रभात खबर छोडने के बाद हरिवंश जनता दल (संयुक्त) के सांसद बने और बाद में राज्यसभा के उप-सभापति पर बातचीत और संवाद का सिलसिला नहीं रुका। स्नेह की अविरल धारा बहती रही। उनके कुछ विवादास्पद निर्णयों पर जरूर मैंने अपनी सार्वजनिक राय जाहिर नहीं की क्योंकि हमारी दोस्ती निजी थी और मैं उसके साथ अपना जीवन बिताना चाहता था, यह निर्णय मेरा अपना था। हरिवंश के साथ मैंने दो स्मरणीय यात्राएँ की, धर्मवीर भारती के ख़िलाफ़ एक यादगार लडाई लडी और डॉक्टर लोहिया और अशोक मेहता के संवाद को याद कहें तो नीले आकाश के नीचे के हर विषय पर बात की।”

इस तरह उन्होंने अपनी बहुत सारी स्मृतियाँ इस आलेख में संकलित की है। साठोत्तरी पीढ़ी के मोहभंग की तुलना में यह स्वप्न-भंग कहीं अधिक गहन और भयानक है, क्योंकि यह परिवर्तन मूल्यगत स्तर पर हो रहा था। सत्ता और जनता के समक्ष ईमान भी बिक रहे थे। विवादास्पद कहे जाने वाले ढांचे के साथ धर्मनिरपेक्षता ढह रही थी। चमकती सड़कें और इमारतें बढ़ रही थीं और ग़रीबी भी, बाहर भी और