विवेकानंद कवि बसंत लखावत

विवेकानंद कवि बसंत लखावत

विवेकानंद 

विश्वनाथ के पुत्र धरा पर, नर नरेंद्र बन  आये।
भक्त भुवनेश्वरी माता के संग,  सबके हित हरसा जाये ।।


ये 1863 था जनवरी थी 12, कलकत्ता की धरती उतरा नरेंद्र नाम सितारा।
कर्म धर्म उपनिषद से उपकृत,  जीवन जगत संवारा।।


दुर्ग नाथ दादा के पोते, गुरु रामकृष्ण हरसाये।
विश्वनाथ के पुत्र धरा पर, नर नरेंद्र बन आये।।


चार खूंट चोसर बिछती थी,  फिरंगी फोज फोलादी।
मान मनुज बेबाक बिका था,  दीन धर्म  बर्बादी ।।


जात जहर को जंग लगाने, वर्ण ध्वजा फहराये। विश्वनाथ के पुत्र धरा पर, नर नरेंद्र बन आये।।


विवेक पुरुष आनंद सदा हो, राज खेतड़ी भाया।
शिकागो की धर्म सभा में, विवेक आनंद ही छाया।।


देश देश के दिव्य दरश हित, देव दूत से जाये।
विश्वनाथ के पुत्र धरा पर, नर नरेंद्र बन आये।।


दया धर्म ही मनुज मान है,  सत्य सीख सिखलाते।।
भोग रोग तो भ्रमित पताका, सबको ये सिखलाते ।।


जगत रूप अद्वैत पिता है, संकल्प सनातन भाये। 
विश्वनाथ के पुत्र धरा पर, नर नरेंद्र बन आये।।


दिव्य धाम वैलूर धरा पर, अंतिम सीख सिखाते।
कर्म पथी बन धरम देश से, परम धाम को जाते।।


नयी सदी के वर्ष दोय में, छोड़ सभी को जाये।।
विश्वनाथ के पुत्र नरेंद्र, नर नरेंद्र सबके मन पर छाये।।

बसंत लखावत, सोजत सिटी