मेरे अधरों के भाव चुन न सके,, मैं कह न सकी तुम सुन न सके

मेरे अधरों के भाव चुन न सके,, मैं कह न सकी तुम सुन न सके

रूह

मेरे अधरों के भाव चुन न सके,,
मैं कह न सकी तुम सुन न सके,

था मौन निमंत्रण उपवन का
तुम प्रीत रागिनी चुन न सके,

मन रेशम सा गढ़ता रहा प्रिय,
तुम आस डोर भी बुन न सके।

मेरे लफ्जों ने तुम्हें पुकारा,
न जाने तुम क्यूं सुन न सके।

मेरी रूह के बेसब्र जज्बातों का,
मौन निमंत्रण तुम सुन न सके।

तेरे गर्मबाहुपाश की थी मुझे,
दरकरार क्यूं तुम सुन न सके ।

राधे ने मुहब्बत में कई पैगाम,
दिये थे तुम्हे तुम चुन न सके।

अंजू जांगिड़ राधे