ग़ज़ल- मुस्कुराते हुए सबको नज़र आएँ कैसे
ग़ज़ल- मुस्कुराते हुए सबको नज़र आएँ कैसे।
बेबसी अपनी ज़माने से छुपाएँ कैसे।
मुस्कुराते हुए सबको नज़र आएँ कैसे।
कैसे मक़बूल दुआएँ ये हमारी होंगी,
अब दुआओं के लिए हाथ उठाएँ कैसे।
दिल गिरफ्तार है इब्लीस के हाथों में कहीं,
हम गुनाहों से भला ख़ुद को बचाएँ कैसे।
जो मुक़द्दर में नहीं है वो नहीं मिलता है,
ये यक़ी ख़ुद को दिलाएँ तो दिलाएँ कैसे।
हमको दीदार -तलब सिर्फ तुम्हारी है यहाँ,
तिश्नगी अपनी निगाहों की बुझाएँ कैसे।
पीठ पीछे जो यहाँ वार किया करते हैं,
ऐसे लोगों को गले अपने लगाएँ कैसे।
आँधियों ने भी तमाशा यूँ लगा रख्खा है,
अपने इन जलते चरागों को बचाएँ कैसे।
हमको इनकार नहीं उसकी अताओं से कभी,
'मीम' रब का जो है एहसान उठाएँ कैसे।
फ़ैज़ अहमद 'मीम'
आरा, भोजपुर, बिहार
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ऑफिसर्स कॉलोनी
चीनी मिल, बक्सर, बिहार