आर्थिक वार पत्रकारों के दमन का एक नया व सफल प्रयोग*

*आर्थिक वार पत्रकारों के दमन का एक नया व सफल प्रयोग* 

आजकल सामने से हमले करने की परिपाटी समाप्त हो गई है।

अब अहंकारी प्रवृत्ति के अधिकारियों व राजनेताओं ने पत्रकारों को आर्थिक रूप से दबाने ,कुचलने का एक सफल प्रयोग प्रारंभ कर दिया है और अधिकांश पत्रकारों के भीरू स्वभाव के चलते वह अपने इस नवीनतम प्रयोग में सफल भी हो रहे हैं।

मारपीट धमकी में तो साक्ष्य रह जाया करते थे परन्तु इस तरह के 'इकोनोमिकल अटेक' को निजी का नाम देकर बड़ी सफाई से पल्ला झाड़ लिया जाता है।और तो और यदि कोई पीड़ित पत्रकार मुखर होकर इसके विरुद्ध खड़ा होने का साहस भी करें तो सबसे पहले पत्रकार ही व्यक्तिगत मामला बता कर किनारा कर लेते हैं।

और तो और इससे जुड़ी ख़बरों तक को प्रकाशित करने का साहस नहीं जुटा पाते...।

कुछ को *उपर* का डर लगता है या इशारा होता है कि खबर का ध्यान रखें...।

इसलिए अधिकारियों और नेताओं के गठजोड़ को अपने इस सफल प्रयोग में आनंद सा आने लगा है।

देखना तो यह है कि आने वाले समय में और कितने पत्रकार या उनके परिजन इस प्रयोग के शिकार होने वाले हैं और फिर कितने उसे भी व्यक्तिगत कहकर पल्ला झाड़ते है...।

कहावत है कि  कबुतर के आंख बंद कर लेने से बिल्ली शिकार बंद नहीं किया करती उसकी तो फितरत ही शिकार करना है आंखें तो कबुतरों को खोलनी होगी.