सांसद मातृभाषा के प्रति दायित्व निभावें : लक्ष्मण दान कविया
सांसद मातृभाषा के प्रति दायित्व निभावें : लक्ष्मण दान कविया
साहित्यकार कविया ने प्रदेश के पच्चीसों सांसदों को लिखा ज्ञापन
रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार पवन पहाड़िया, डेह
मूंडवा - अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के संस्थापक लक्ष्मण दान कविया ने प्रदेश के पच्चीसों सांसदों से मातृभाषा राजस्थानी के प्रति अपना दायित्व निभाने का आग्रह दोहराया है।कविया ने प्रदेश के पच्चीसों सांसदों को लिखे ज्ञापनों में लिखा कि राजस्थानी भाषा विश्व की पच्चीसवीं एवं देश की तीसरी साहित्य समृद्ध भाषा है। आजादी से पूर्व की रियासतों के कामकाज की भाषा भी रह चुकी है। राजस्थानी की कानूनी मान्यता की मांग देश की आजादी के पूर्व से गांधीवादी विचारधारा से चली आ रही है। यह दुखद स्थिति है कि यहां की जनता एवं राजनेता दोनों ही पहलु अपनी मातृभाषा के प्रति उदासीन रहे हैं जिसके कारण राजस्थानी की पहचान दिनों-दिन कम होती जा रही है। भाषाओं की मान्यता का मापदंड सही नहीं होने के कारण राजस्थानी भाषा से हर क्षेत्र में पिछड़ी भाषाओं को राजनैतिक कारणों से संवैधानिक मान्यता दे दी गई है। राजस्थान प्रदेश की जनता बड़े दिल की होने के कारण हिन्दी का राष्ट्रभाषा बनाने के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए अपनी मातृभाषा की कुर्बानी दी है। आजादी के तुरंत बाद प्रदेशवासी नेताओं के झूठे आश्वासन के शिकार होकर प्रदेश के हिन्दी भाषी प्रदेश बनवाने में रूचि ली थी। अतः अब समय आ गया है कि प्रदेश के पच्चीसों सांसद अपनी मातृभाषा के प्रति दायित्व को निभाते हुए संसद के शीतकालीन सत्र में राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता की पुरजोर मांग उठाने का श्रेय एवं प्रेय कार्य करावें।