पुस्तक समीक्षा : साथ मेरे रहीं मेरी तन्हाइयाँ खूबसूरत फूलों का गुलदस्ता : अब्दुल समद राही
पुस्तक समीक्षा :
साथ मेरे रहीं मेरी तन्हाइयाँ खूबसूरत फूलों का गुलदस्ता : अब्दुल समद राही
झीलों की नगरी उदयपुर के वरिष्ठ ग़ज़लकार राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक ख़ुर्शीद शेख़ 'ख़ुर्शीद' का दूसरा ग़ज़ल संग्रह *'साथ मेरे रहीं मेरी तन्हाइयाँ'* हाल ही में मंज़र-ए-आम पर आया है। इससे पहले इनका पहला ग़ज़ल संग्रह *'हौसलों की उड़ान'* प्रकाशित होकर अदबी हलकों में काफ़ी मक़बूल हो चुका है।
80 ग़ज़लों पर मुश्तमिल यह नया संग्रह सिर्फ इश्क़-ओ-मोहब्बत तक महदूद नहीं है, बल्कि ज़िंदगी के तमाम पहलुओं पर फोकस करता हुआ एक बेहतरीन गुलदस्ता है। इसकी ग़ज़लें कहीं ज़ख़्मों पर मरहम रखती हुई, तो कहीं हँसती-मुस्कुराती और कहीं आँखें नम करती हुई प्रतीत होती हैं। शायर की सबसे बड़ी ख़ूबी इनकी सादा, रवाँ और दिल में उतर जाने वाली ज़बान है।
इस किताब के चार नुमाइंदा रंग इस पुस्तक की जान हैं -
*1. माँ की अज़मत - इस पुस्तक की आत्मा*
ख़ुर्शीद साहब ने माँ पर दो मुकम्मल ग़ज़लें कही हैं, जो इस संग्रह को एक अलग मुकाम देती हैं -
सियाही रात की जब-जब सताती है।
दुआ माँ की हमें तब-तब बचाती है।
लगे जो खेल में भी चोट हलकी सी,
समन्दर आँख से पल पल बहाती है।
और दूसरी ग़ज़ल में -
यह दुनिया इतनी सुहानी न होती।
अगर इसमें माँ की कहानी न होती।
ग़मों का दरिया कभी पार न होता,
शामिल जो माँ के अश्कों की रवानी न होती।
माँ का साया सायबान बन सर पर रहा है हमारे,
दिल से इसमें गर माँ की निगहबानी न होती।
माँ पर इतनी सच्ची और पाक ग़ज़ल बहुत कम पढ़ने को मिलती है।
*2. वतन की शान - जज़्बा-ए-वतन*
पेज नं. 80 पर वतन पर यह बुलंद ग़ज़ल है -
बड़ी शान वाला वो वतन है हमारा,
दिलों में समाया जो वतन है हमारा।
नहीं कोई ऊंचा ना हम सर रहा है,
अजब आन जिसकी सो वतन है हमारा।
नज़र से गिरा दे अगर सारा ज़माना,
उठा दे उसे भी वो वतन है हमारा।
अँधेरे मिटा दे जो दिलों से हमारा
मुनव्वर करे दिल को वतन है हमारा
'मुनव्वर' यानी रौशन करने वाला। वतन के लिए इससे बेहतर लफ़्ज़ नहीं हो सकता।
*3. सच्चे प्यार की परिभाषा -*
पेज नं. 67 की यह ग़ज़ल इश्क़ को नई परिभाषा देती है -
सच्ची ख़ुशी तो बढ़ाती रही प्यार,
नफ़रत दिलों में रखे वो नहीं प्यार।
बूढ़े नहीं सिर्फ़ हैं क़द्र दां वोह,
उनका रखें मान, सच्चा वही प्यार।
भाई-बहिन के रहे जो वफ़ादार,
मिलती ख़ुशी और मिलता सही प्यार।
यहाँ प्यार महबूब तक सीमित नहीं, बड़ों की कद्र और भाई-बहन की वफ़ादारी तक वसीअ हो गया है।
*4. ज़िंदगी का फ़लसफ़ा -*
ज़िन्दगी में गर ज़िन्दादिली ना होती।
ज़िन्दगी इतनी दिलकश खिली ना होती।
आदमी को गर ग़म मिले ना होते,
जानकारी ख़ुशियों की मिली ना होती।
यह शेर इस किताब का निचोड़ है। काँटों में भी फूल देखने की मुस्बत सोच ही ख़ुर्शीद साहब की शायरी और शख़्सियत दोनों की पहचान है।
कुल मिलाकर साहित्य अकादमी उदयपुर के आंशिक सहयोग से प्रकाशित 'साथ मेरे रहीं मेरी तन्हाइयाँ' एक संग्रहणीय और पढ़ने लायक किताब है। उदयपुर की अदबी फ़िज़ा में यह एक ख़ुशगवार इज़ाफ़ा है। ग़ज़ल से मोहब्बत करने वाले हर शख़्स के घर में यह किताब होनी चाहिए।
ख़ुर्शीद शेख़ 'ख़ुर्शीद' साहब को इस ख़ूबसूरत पेशकश के लिए दिली मुबारकबाद।
पुस्तक : साथ मेरे रहीं मेरी तन्हाईयां
लेखक : खुर्शीद शेख खुर्शीद
समीक्षक : अब्दुल समद राही
संस्करण : 2026
मूल्य : 120 रुपए
मुद्रक : स्वदेशी ऑफसेट, उदयपुर।