आधुनिकता की अंधी दौड़ और बिखरते भारतीय संस्कार : डॉ, पायल गोयल

आधुनिकता की अंधी दौड़ और बिखरते भारतीय संस्कार : डॉ, पायल गोयल

आधुनिकता की अंधी दौड़ और बिखरते भारतीय संस्कार : डॉ, पायल गोयल

     आज का युग तीव्र गति से बदलती आधुनिकता का युग है जिससे विज्ञान, तकनीक, डिजिटल क्रांति और वैश्वीकरण से मानव जीवन को अभूतपूर्व सुविधाएँ प्राप्त हो रही है इस आधुनिकता की तेज़ रफ्तार दौड़ में सभी भागे जा रहे लेकिन इस दौड़ में कहीं न कहीं हम अपनी संस्कृति, संस्कार और शिष्टाचार को भूलते जा रहे हैं , इस चकाचौंध की अंधी दौड़ में हमारे सामने एक गंभीर प्रश्न आ कर खड़ा हो जाता है कि क्या हम अपने संस्कारों और नैतिक मूल्यों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं?

भारतीय संस्कृति सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “अतिथि देवो भवः” जैसे आदर्शों पर आधारित रही है साथ ही परिवार, समाज और गुरु-शिष्य परंपरा हमारे सामाजिक जीवन की मजबूत नींव बनी रही है किंतु आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में संयुक्त परिवारों का स्थान एकल परिवारों ने ले लिया है। अभिभावको के पास आज संस्कार देने का समय कम होता जा रहा है और बच्चो का समय मोबाईल और अन्य प्रकार के गैजट्स में निकल रहा है जिसके कारण उनका शारीरिक और मानसिक विकास बाधित हो रहा है परिणामस्वरूप नई पीढ़ी में सहनशीलता, बड़ों के प्रति सम्मान और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना कमजोर होती जा रही रही है , जोकि आने वाले भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन कर सामने आ सकती है I

पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण ने भी इस स्थिति को और जटिल बना दिया है जिसका बदलाब आज हमारे यहाँ यहाँ दिखने लग गया है ,हमारे देश में विवाह को एक पवित्र बंधन माना गया है, यह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन होता है किंतु , वर्तमान समय में कुछ युवा विवाह के स्थान पर ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ को विकल्प के रूप में चुन रहे हैं बदलते सामाजिक और कानूनी परिवेश ने इन संबंधों को मान्यता दी है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार के अंतर्गत वयस्कों को अपनी पसंद से जीवन जीने की स्वतंत्रता प्रदान की है, जिसमें समलैंगिक संबंधों और अन्य वैकल्पिक संबंधों को भी कानूनी संरक्षण मिला है। यह परिवर्तन समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को दर्शाता है, परंतु इसके साथ सामाजिकता और नैतिकता का भी हास होता जा रहा है जोकि हमारे देश की संस्कृति और संसकारो पर बुरा असर छोड़ रहा है अतःयह एक विचारणीय विषय है

अक्सर देखा जाता है कि आधुनिकता को अपनाने वाला व्यक्ति परंपराओं को पिछड़ापन या बाधा मान लेता हैऔर उसे लगता है कि पारंपरिक मूल्य प्रगति और कार्यकुशलता में रुकावट हैं, परिणामस्वरूप, रिश्तों की गर्माहट और पारिवारिक जुड़ाव कमजोर होते जा रहे है और इसी आधुनिकता की होड़ में धैर्य और पारस्परिक सम्मान जैसे गुण पीछे छूटते जा रहे है

मेरे विचार में आधुनिकता का अर्थ केवल तकनीक और तेज़ी नहीं है अपितु यह एक प्रगतिशीलता का माध्यम एवं अज्ञान और अंधविश्वास से मुक्त करने तथा जीवन को बेहतर बनाने की सकारात्मक दृष्टि है, इस तकनीक के साथ हमे कदम से कदम मिलाना चाहिए, परंतु अपनी संस्कृति और जीवन मूल्यों को भी साथ लेकर चलना चाहिए , सच्ची आधुनिकता वही है, जो हमें साधन-संपन्न, जागरूक और सम्मानित जीवन जीने की प्रेरणा दे, और साथ ही हमारे संस्कारों और मानवीय मूल्यों को सुरक्षित रखे।

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डॉ, पायल गोयल

असिस्टेंस प्रोफेसर

एस एस जैन सुबोध पी जी महाविद्यालय ,जयपुर