सूफ़ियाना सच-नदीम अहमद नदीम
सूफ़ियाना सच-
अस्पताल की दीवारें, मशीनों की धीमी आवाज़ें
और वक़्त की उदाससूफ़ियाना सच निगाह…
लेकिन इसी माहौल में अचानक
एक करामात घटित होती है।
बिस्तर पर गुरु हैं
जिन्होंने उम्र भर सुरों को साधा,
जिनकी उँगलियों, साँसों और ख़ामोशी में
संगीत बोलता रहा।
आज वही गुरु इलाज के मरहले में हैं।
सामने उनकी शागिर्द खड़ी है।
हाथ जोड़कर नहीं,
सुर जोड़कर।
वो कोई गीत नहीं गा रही,
वो अपनी तालीम
और अपनी रूह पेश कर रही है।
“हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे…”
ये मिसरा यहाँ महज़ गीत नहीं रहता,
ये बंदगी बन जाता है।
गुरु के लिए, संगीत के लिए,
और उस रिश्ते के लिए
जो न दुनियावी है, न फ़ानी।
इस लम्हे में अस्पताल
एक ख़ानक़ाह बन जाता है,
जहाँ दवा से पहले दुआ उतरती है,
और सुरों से पहले सुकून।
यही सूफ़ियाना सच है—
जहाँ तालीम इबादत हो जाए
और संगीत, शिफ़ा।
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नदीम अहमद नदीम
बीकानेर, राजस्थान