T³: टैरिफ, ट्रम्प और ट्रेड वार – बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत का उभार : डॉ. देवेंद्र कुमार शर्मा

T³: टैरिफ, ट्रम्प और ट्रेड वार – बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत का उभार : डॉ. देवेंद्र कुमार शर्मा

T³: टैरिफ, ट्रम्प और ट्रेड वार – बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत का उभार : डॉ. देवेंद्र कुमार शर्मा

        वैश्विक व्यापार व्यवस्था इस समय एक गहरे संक्रमण काल से गुजर रही है, जहाँ आर्थिक नीतियाँ केवल कराधान या संरक्षणवाद तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि वे भू-राजनीतिक रणनीति का प्रमुख उपकरण बन चुकी हैं। Donald Trump के नेतृत्व में लागू की गई “America First” रणनीति के अंतर्गत अमेरिका ने 2025 में आक्रामक टैरिफ नीति अपनाई। इस नीति का घोषित उद्देश्य घरेलू उद्योगों की सुरक्षा, व्यापार घाटे में कमी और वैश्विक स्तर पर रणनीतिक आर्थिक लाभ प्राप्त करना था। स्टील, एल्यूमिनियम, इलेक्ट्रॉनिक्स और कृषि उत्पादों पर लगाए गए उच्च आयात शुल्क ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को झकझोर दिया। इसी समय रूस-यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा संकट और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया, जिसके परिणामस्वरूप विश्व व्यापार में अनिश्चितता, लागत वृद्धि और निवेश में ठहराव स्पष्ट रूप से देखा गया।

टैरिफ में बदलाव: 18% से 10% – नीति का नया मोड़

प्रारंभिक चरण में लगाए गए उच्च शुल्कों को अंतरराष्ट्रीय दबाव, घरेलू उत्पादन लागत में वृद्धि और व्यापारिक साझेदारों के साथ वार्ताओं के बाद घटाकर 18% किया गया। इस निर्णय को वैश्विक बाजारों ने राहत के संकेत के रूप में लिया। 18% टैरिफ व्यवस्था के दौरान आयातित कच्चे माल की लागत में आंशिक कमी आई, जिससे विनिर्माण क्षेत्र को सीमित राहत मिली और आपूर्ति श्रृंखला में कुछ हद तक स्थिरता लौटी। निवेशकों में सावधानीपूर्ण आशावाद देखने को मिला तथा विकासशील देशों के निर्यातकों को भी आंशिक लाभ प्राप्त हुआ।

हालाँकि यह स्थिरता स्थायी सिद्ध नहीं हुई। रणनीतिक पुनर्मूल्यांकन और घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता को ध्यान में रखते हुए अमेरिका ने टैरिफ को और घटाकर 10% कर दिया। 10% टैरिफ वातावरण ने वैश्विक व्यापार में अपेक्षाकृत संतुलन स्थापित किया। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में सुधार हुआ, बहुपक्षीय व्यापार वार्ताओं के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनीं और आपूर्ति श्रृंखला के पुनर्गठन की प्रक्रिया तेज हुई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि टैरिफ केवल राजस्व नीति नहीं, बल्कि कूटनीतिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय वार्ता का एक रणनीतिक साधन भी हैं।

उच्च टैरिफ आयात को कम कर सकते हैं, किंतु प्रतिशोधात्मक शुल्क निर्यात को भी प्रभावित कर सकते हैं। 10% टैरिफ व्यवस्था ने इस असंतुलन को आंशिक रूप से नियंत्रित करने का प्रयास किया है।

भारत पर प्रभाव और रणनीतिक प्रतिक्रिया

भारत को प्रारंभिक चरण में उच्च टैरिफ का सामना करना पड़ा, विशेषकर ऊर्जा आयात और औद्योगिक उत्पादों के संदर्भ में। अमेरिका की अपेक्षा थी कि भारत अपनी ऊर्जा नीति, खासकर रूस से तेल आयात के मामले में, समायोजन करे। किंतु भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए स्पष्ट किया कि व्यापार और ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय होगी।

जब टैरिफ 18% और बाद में 10% तक घटे, तब भारतीय निर्यातकों—विशेषकर स्टील, ऑटो पार्ट्स, फार्मास्यूटिकल्स और आईटी सेवाओं—को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलने लगा। भारत ने “चाइना प्लस वन” रणनीति के तहत वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करने का प्रयास तेज किया। Make in India और Production Linked Incentive scheme जैसी पहलों ने विनिर्माण क्षेत्र को नई गति प्रदान की, जिससे भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के पुनर्गठन में एक संभावित केंद्र के रूप में उभरने लगा।

चुनौतियाँ अभी भी शेष

हालाँकि टैरिफ दरें घटकर 10% तक आ गई हैं और वैश्विक व्यापार वातावरण में आंशिक स्थिरता दिखाई दे रही है, फिर भी चुनौतियाँ समाप्त नहीं हुई हैं। वैश्विक बाजार अभी भी अनिश्चितता से घिरा हुआ है, क्योंकि भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की मौद्रिक नीतियाँ लगातार बदल रही हैं। निवेशक दीर्घकालिक प्रतिबद्धताओं के बजाय सतर्क रणनीति अपना रहे हैं, जिससे पूंजी प्रवाह में अस्थिरता बनी हुई है।

डॉलर पर उच्च निर्भरता भी एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक चुनौती है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार मुख्यतः अमेरिकी डॉलर में होने के कारण विनिमय दर में उतार-चढ़ाव का सीधा प्रभाव आयात लागत और चालू खाते पर पड़ता है। शिपिंग लागत और लॉजिस्टिक बाधाएँ भी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की संवेदनशीलता को उजागर करती हैं। किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष या व्यापारिक अवरोध से उत्पादन लागत और उपभोक्ता मूल्य प्रभावित हो सकते हैं।

लघु एवं मध्यम उद्योग (MSMEs) इन परिस्थितियों में सबसे अधिक दबाव झेलते हैं। सीमित पूंजी, ऊँची ब्याज दरें और कच्चे माल की अस्थिर कीमतें उनके लाभांश को प्रभावित करती हैं। बड़े उद्योग जोखिम प्रबंधन में सक्षम होते हैं, जबकि छोटे उद्योग वैश्विक उतार-चढ़ाव के प्रति अधिक संवेदनशील रहते हैं।

भारत की वैश्विक स्थिति: संतुलन और अवसर

वर्तमान वैश्विक पुनर्संरचना के दौर में भारत ने संतुलित कूटनीति, मजबूत डिजिटल अवसंरचना और तकनीकी निवेश के माध्यम से अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया है। भारत एक ओर अमेरिका और यूरोप के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ सहयोग का विस्तार भी कर रहा है। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर ने भारत को उभरती डिजिटल अर्थव्यवस्था का मॉडल बनाया है।

विशेष रूप से BRICS देशों के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार को बढ़ावा देने की पहल ने डॉलर निर्भरता को चुनौती देने की दिशा में कदम बढ़ाया है। यदि यह पहल संस्थागत रूप से मजबूत होती है, तो बहुध्रुवीय मुद्रा व्यवस्था की संभावना बढ़ सकती है।

भविष्य की दिशा

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि 10% टैरिफ के संतुलित वातावरण में वैश्विक व्यापार सहयोग की संभावनाएँ बढ़ी हैं। इस संदर्भ में भारत के लिए निर्यात विविधीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। यदि भारत फार्मास्यूटिकल्स, रक्षा उत्पादन, कृषि-प्रसंस्करण और उच्च तकनीक विनिर्माण जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करता है, तो वह वैश्विक मांग के उतार-चढ़ाव से बेहतर ढंग से निपट सकता है।

सेमीकंडक्टर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के क्षेत्र में नेतृत्व प्राप्त करना भारत के लिए रणनीतिक प्राथमिकता बन चुका है। चिप निर्माण, डिजाइन और डेटा अवसंरचना में निवेश भारत को वैश्विक तकनीकी मूल्य श्रृंखला में ऊँचा स्थान दिला सकता है। ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करना, नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाना और बहुपक्षीय व्यापार समझौतों का विस्तार करना भी भविष्य की दिशा में निर्णायक कदम होंगे।

समग्र रूप से, 18% से 10% टैरिफ की यात्रा केवल दरों में कमी की कहानी नहीं है, बल्कि वैश्विक आर्थिक शक्ति-संतुलन के पुनर्निर्माण का संकेत है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत संतुलन, आत्मनिर्भरता और अवसरों के समन्वय के माध्यम से एक उभरती हुई निर्णायक आर्थिक शक्ति के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है।

इन समस्त विश्लेषणों और नीतिगत परिप्रेक्ष्यों का विस्तृत अध्ययन मेरी पुस्तक “T³ – Trump, Tariffs and Trade War” में भी प्रस्तुत किया गया है, जिसमें वैश्विक शक्ति-संतुलन, टैरिफ रणनीति और भारत की उभरती भूमिका का गहन विश्लेषण किया गया है।

निष्कर्ष

टैरिफ राजनीति के इस दौर में वैश्विक व्यापार संतुलन पुनर्परिभाषित हो रहा है। 10% टैरिफ व्यवस्था ने अवसर और प्रतिस्पर्धा दोनों को जन्म दिया है। रणनीतिक कूटनीति, तकनीकी निवेश और निर्यात विविधीकरण के माध्यम से भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी भूमिका सुदृढ़ कर उभरती आर्थिक शक्ति बन सकता है।

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डॉ. देवेंद्र कुमार शर्मा

एसोसिएट प्रोफेसर

एस. एस. जैन सुबोध पी. जी. कॉलेज, जयपुर