ग़ज़ल रिश्तों की डोरी में गॉंठें हैं गहरी।

ग़ज़ल रिश्तों की डोरी में गॉंठें हैं गहरी।

रिश्तों की डोरी में गॉंठें हैं गहरी।

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बादल ने सूरज को थोड़ा डॉंटा है।

दिन में शायद इस कारण सन्नाटा है।। 

घर में रहती है हरदम अब खामोशी।

जब से हिस्सा आपस में कुछ बॉंटा है।।

भूखों ने कब समझा असली किल्लत को।

उतनी रोटी बनती जितना आटा है।।

रिश्तों की डोरी में गॉंठें हैं गहरी।

नफ़रत की कैंची ने उनको काटा है।।

दुश्मन होंगे वे कल तक जो थे अपने।

मतलब का हर सौदा समझो घाटा है।।

मण्डेला झूठा क्या जाने गैरत को।

जिसने थूका फिर उसने ही चाटा है‌।।

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रचयिता - *कैलाश मण्डेला*