हिंदी लोक एवं राजभाषा है - लक्ष्मणदान कविया
हिंदी लोक एवं राजभाषा है - लक्ष्मणदान कविया
हिन्दी दिवस पर अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति की ओर से ऑनलाइन गोष्ठी आयोजित

वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल समद राही
डेह/नागौर - हिन्दी दिवस पर अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति की ओर से ऑनलाइन गोष्ठी पवन पहाड़िया की अध्यक्षता में आयोजित की गई। मुख्य वक्ता राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार सतसई सम्राट लक्ष्मणदान कविया ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि हिन्दी लोक एवं राजभाषा है। हिन्दी के विकास में राजस्थानी भाषा ने अपनी अहम भूमिका निभाई है। हिन्दी के आदिकाल की सारी साहित्य सामग्री राजस्थानी भाषा की देन रही है। हिन्दी को लोकभाषा एवं राजभाषा बनाने में राजस्थानी वासियों ने अपनी मातृभाषा राजस्थानी को दरकिनार करते हुए हिन्दी को अपना लिया जिसके दुष्परिणाम स्वरूप राजस्थानी आजादी के 80 वर्षों बाद भी संवैधानिक मान्यता की मोहताज बनी हुई है। हिन्दी को अभी राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है।दक्षिण भारत में विरोध होने के बावजूद भी हिन्दी अपने विकास पर अबाध गति से अग्रसर हो रही है।प्रवासी राजस्थानियों ने भारत के कोने-कोने में जाकर हिंदी के विकास मार्ग को प्रशस्त किया है।युवा गीतकार प्रहलाद सिंह झोरड़ा ने कहा कि हिन्दी भारत भाल की बिंदी है।आज विश्व में हिन्दी बोलने वालों की संख्या करोड़ों है। हिन्दी में लोकप्रिय साहित्य लिखा जा रहा है। हिन्दी का बाल साहित्य बाल पीढ़ी को अच्छे संस्कार देने में सक्षम है। हमें हिन्दी को अपने दैनंदिन में अपना कर इसको आगे बढ़ाने का श्रेय एवं प्रेय कार्य करना चाहिए। अध्यक्ष पवन पहाड़िया ने कहा कि हिन्दी भाषा का भविष्य उज्जवल है। हिन्दी के विकास में राजस्थानी कभी रोड़ा नहीं बनी। राजस्थानी भाषा का इतिहास बहुत पुराना है जबकि हिन्दी का विकास तो दो सौ वर्षौ पुराना ही माना जा रहा है। राजस्थानी से ही हिन्दी का उदगम हुआ है। गोष्ठी में भंवर वैष्णव,श्रीराम वैष्णव,सांवलदान कविया,मीठूराम ढाका,मेहराम धोलिया,फतुराम छाबा, दिनेश फूलवारिया, गोपाल तंवर, सत्यनारायण सेन, शैतानाराम टाक, रामप्रताप सांखला आदि जुड़े रहे।