संबोधि धाम में लाइफ इंजीनियरिंग प्रोग्राम आयोजित
कर्मों की वजह से आते हैं सुख-दुख न कि दूसरों की वजह से - डॉ मुनि शांति प्रिय सागर
संबोधि धाम में लाइफ इंजीनियरिंग प्रोग्राम आयोजित
जोधपुर 7 अप्रैल/ डॉ मुनि शांति प्रिय सागर महाराज ने कहा कि कर्मों की वजह से आते हैं सुख-दुख न कि दूसरों की वजह से। संसार एक अनुगूंज है। यहाँ व्यक्ति जैसे कर्म करेगा उसे वैसे ही वापस फल लौटकर आएंगे। जैसे दूध का सार मलाई है वैसे ही जीवन का सार भलाई है। जो औरों को भला करता है वह इंसान नहीं जीता-जागता भगवान होता है। उन्होंने कहा कि अगर हम किसी का भला नहीं कर सकते तो बुरा कभी न करें। बुरे का परिणाम हमेशा बुरा आता है। अगर आपने किसी का भला किया है तो भूल जाएं और किसी ने आपका भला किया है तो उसे सदा याद रखें।
मुनि प्रवर कायलाना रोड स्थित संबोधि धाम में आयोजित लाइफ इंजीनियरिंग प्रोग्राम में साधक भाई बहनों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कर्म का सरल अर्थ है — हमारे विचार हमारी वाणी और हमारे द्वारा किया गया हर व्यवहार और व्यापार। हर कर्म का एक परिणाम होता है जो कभी तुरंत तो कभी समय के बाद मिलता है। जैसे : अच्छा कर्म अर्थात सुख और बुरा कर्म अर्थात दुख। यह प्रकृति का अटल नियम है — जैसा बोओगे वैसा काटोगे।
उन्होंने कहा कि अक्सर हम सोचते हैं : उसने मुझे दुख दिया, उसकी वजह से मैं परेशान हूँ लेकिन सच्चाई यह है कि कोई भी व्यक्ति केवल “निमित्त” होता है कारण नहीं।
कारण तो हमारे अपने कर्म ही होते हैं। अगर किसी ने आपको अपमानित किया, तो वह व्यक्ति सिर्फ माध्यम है असल कारण हमारे पूर्व कर्म हैं जिनका फल अब मिल रहा है।
उन्होंने कहा कि जब हम यह मान लेते हैं कि मेरे सुख-दुख के जिम्मेदार मैं खुद हूँ तो जीवन में शिकायत खत्म हो जाती है, हम दूसरों को दोष देना बंद कर देते हैं। मन शांत हो जाता है क्रोध द्वेष नफरत कम हो जाते हैं।जिम्मेदारी का भाव आता है, हम अपने कर्म सुधारने लगते हैं। संबंध सुधरते हैं क्योंकि हम दूसरों को दोषी मानना छोड़ देते हैं।
उन्होंने कहा कि जब भी दुख मिले, खुद से पूछें :
मैंने ऐसा कौन सा कर्म किया होगा जिसका यह फल है? जब सुख मिले अहंकार न करें — समझें कि यह भी अच्छे कर्मों का परिणाम है। दुख से बचने और सुख पाने के लिए हम अच्छा सोचें, अच्छा बोलें, अच्छा करें। सदा याद रखें, सुख-दुख बाहर से नहीं आते वे हमारे ही कर्मों का प्रतिबिंब हैं। इसलिए दूसरों को बदलने की बजाय अपने कर्मों को सुधारना ही सच्ची बुद्धिमानी है।
जब उन्होंने तीर्थंकर पार्श्वनाथ और कमठ तपस्वी की प्रेरक कहानी सुनाई तो सभी रोमांचित हो गए।
इससे पूर्व उन्होंने सभी साधकों को शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बैठकर योगासन करवाएं और दिमाग को शांत संतुलित और एकाग्र बनाने के लिए ओमकार मंत्र मेडिटेशन का अभ्यास करवाया।
कार्यक्रम में संपत सेन विनोद प्रजापत शेखर जैन डॉ डी के पवार विशेष रूप से मौजूद थे।