विजयदान देथा बिज्जी शताब्दी समारोह में डॉ. कालू खां देशावाली का सारगर्भित उद्बोधन
विजयदान देथा बिज्जी शताब्दी समारोह में डॉ. कालू खां देशावाली का सारगर्भित उद्बोधन
वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल समद राही
चूरू / मेड़ता। प्रयास संस्थान, चूरू द्वारा आयोजित विजयदान देथा बिज्जी शताब्दी समारोह के प्रथम दिवस द्वितीय सत्र 'बिज्जी के लेखन में लोक' में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित राजस्थानी भाषा के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कालू खां देशावाली ने अपनी महती भूमिका निभाई।

सभाकक्ष, श्री ओसवाल श्रीसंघ पंचायत भवन में आयोजित इस सत्र में डॉ. देशावाली ने मंच से बिज्जी के साहित्यिक अवदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बिज्जी ने राजस्थान के लोक को केवल लिखा नहीं, बल्कि उसे जीया है। उनकी कहानियों में चौधर, सामंती जुल्म के खिलाफ प्रतिरोध और आम जन की चेतना एक साथ मुखर होती है।
उन्होंने कहा कि बिज्जी का लेखन राजस्थानी भाषा को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने वाला है। 'बातां री फुलवारी' जैसी कृतियां लोक कथाओं के माध्यम से बड़े सामाजिक सच को सामने लाती हैं। बिज्जी का लोक, केवल अतीत का बखान नहीं, बल्कि भविष्य का रास्ता दिखाने वाला लोक है। डॉ. देशावाली ने बिज्जी के लेखन में आए ठेठ लोक शब्दों - कटका, गीड, गूंगा, ठेठी, उबासी आदि पर उदाहरण सहित विस्तार से समझाया।
संयोजक डॉ. दुलाराम सहारण की सराहनीय भूमिका
इस पूरे शताब्दी समारोह के सफल आयोजन में प्रयास संस्थान के अध्यक्ष एवं समारोह संयोजक डॉ. दुलाराम सहारण की महती एवं सराहनीय भूमिका रही। डॉ. सहारण ने अपने अथक परिश्रम, साहित्यिक निष्ठा और कुशल संयोजन से बिज्जी के शताब्दी वर्ष को एक यादगार साहित्यिक उत्सव बना दिया। राजस्थानी भाषा, लोक संस्कृति और बिज्जी साहित्य के प्रति उनका समर्पण भाव सभी के लिए प्रेरणास्पद है। उनके नेतृत्व में ही चूरू की धरती पर देशभर के विद्वान एक मंच पर जुट सके।

इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार नंद भारद्वाज, रामस्वरूप किसान, डॉ. मीनाक्षी बोराणा, कृष्णा जाखड़, बसंती पंवार, मिठेश निर्मोही, सीपी देवल, मंगत बादल, कल्याण सिंह शेखावत, चांद कोर सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी, लेखक और विद्यार्थी उपस्थित रहे।