ग़ज़ल : ये किसने दी है सदा रात के अँधेरे में 

ग़ज़ल : ये किसने दी है सदा रात के अँधेरे में 

ग़ज़ल : ये किसने दी है सदा रात के अँधेरे में 

चिराग़ किसका बुझा रात के अँधेरे में। 

 धुआँ कहाँ से उठा रात के अँधेरे में। 

मुझे तो दश्त में कोई नज़र नहीं आता 

ये किसने दी है सदा रात के अँधेरे में। 

तेरी तलब में सरे-राह इक दीया बनके 

 तमाम उम्र जला रात के अँधेरे में। 

पता नहीं कोई मुझको कहाँ तलाश करूँ 

वो किस जगह पे छिपा रात के अँधेरे में। 

जलाके याद की शम्अ़यें क़दम-क़दम मैंने 

सफ़र तमाम किया रात के अँधेरे में। 

सफ़ीना दूर किनारे से रह गया 'माँझी'

चली कुछ ऐसी हवा रात के अँधेरे में। 

शब्दार्थ--1. दश्त=जंगल, 2. तलब=चाहत।

                                 -देवेन्द्र माँझी 

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