अंग्रेजी हुकूमत को गोलियों से ललकारने वाली ‘अग्निकन्या’ बीना दास : धर्मपाल गाँधी
आलेख/ जयंती विशेष/ 24 अगस्त
अंग्रेजी हुकूमत को गोलियों से ललकारने वाली ‘अग्निकन्या’ बीना दास : धर्मपाल गाँधी
देश की आजादी के लिए बंदूक उठाई, जेल की यातनाएं सहीं और आजाद भारत में गुमनामी में हुआ दर्दनाक अंत
भारत की आजादी का इतिहास उन वीर-वीरांगनाओं के त्याग, संघर्ष और बलिदान से भरा हुआ है, जिन्होंने अपने सुख, सुविधाओं और जीवन की परवाह किए बिना देश को अंग्रेजी गुलामी से मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया। ऐसी ही महान क्रांतिकारी थीं बीना दास, जिन्होंने मात्र 21 वर्ष की उम्र में अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती देकर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था। बीना दास का जन्म 24 अगस्त 1911 को बंगाल के कृष्णानगर में प्रसिद्ध शिक्षक बेनी माधव दास और समाजसेविका सरला देवी के घर हुआ था। उनके पिता बेनी माधव दास अपने समय के प्रसिद्ध शिक्षक थे और नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी उनके विद्यार्थियों में शामिल रहे। उनकी माता सरला देवी समाजसेवा में सक्रिय थीं और निराश्रित महिलाओं के लिए ‘पुण्याश्रम’ नामक संस्था का संचालन करती थीं। ऐसे देशभक्ति और समाजसेवा से भरे वातावरण में पली-बढ़ीं बीना दास के मन में बचपन से ही राष्ट्रप्रेम की भावना पैदा हो गई थी। बीना दास की बड़ी बहन कल्याणी दास भी स्वतंत्रता सेनानी थीं। दोनों बहनों ने विद्यार्थी जीवन से ही अंग्रेजी शासन के खिलाफ होने वाले आंदोलनों और प्रदर्शनों में भाग लेना शुरू कर दिया था। बीना दास ने सेंट जॉन्स डायोसेसन गर्ल्स हाई स्कूल और बेथ्यून कॉलेज कलकत्ता से शिक्षा प्राप्त की। वह महात्मा गाँधी के विचारों से प्रभावित थीं और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के राष्ट्रवादी व्यक्तित्व ने भी उन्हें काफी प्रभावित किया। सुभाषचंद्र बोस का उनके परिवार में आना-जाना था और वह बीना दास के जीवन में मार्गदर्शक की भूमिका निभाते रहे। वर्ष 1928 में बीना दास सुभाषचंद्र बोस द्वारा स्थापित बंगाल वालंटियर संगठन से जुड़ीं। इसी दौरान उन्होंने साइमन कमीशन के विरोध में छात्र आंदोलन में भाग लिया। छात्राओं को संगठित करने के लिए बने छात्री संघ से भी वह जुड़ीं। इस संगठन में छात्राओं को आत्मरक्षा और शारीरिक प्रशिक्षण दिया जाता था। उस समय समाज में यह सोच प्रचलित थी कि हथियार चलाना केवल पुरुषों का काम है, लेकिन बीना दास ने इस सोच को चुनौती देते हुए साबित किया कि देश की बेटियां भी मातृभूमि की रक्षा के लिए किसी भी संघर्ष से पीछे नहीं हटेंगी। धीरे-धीरे बीना दास का संपर्क क्रांतिकारियों से बढ़ता गया। वह युगांतर दल के क्रांतिकारियों के संपर्क में आईं और देश को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराने के लिए सशस्त्र क्रांति के रास्ते पर आगे बढ़ीं। उनके मन में अंग्रेजी शासन के खिलाफ गहरा आक्रोश था और वह भारत को स्वतंत्र देखने के लिए किसी भी त्याग के लिए तैयार थीं। इसी संकल्प के साथ उन्होंने 6 फरवरी 1932 को वह कदम उठाया, जिसने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की महान महिला क्रांतिकारियों की पंक्ति में हमेशा के लिए स्थापित कर दिया। उस दिन कलकत्ता विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह था और बंगाल के तत्कालीन गवर्नर स्टेनली जैक्सन समारोह में विद्यार्थियों को संबोधित करने वाले थे। बीना दास भी अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद समारोह में मौजूद थीं। उन्हें अपनी डिग्री प्राप्त करनी थी, लेकिन उनके मन में इससे कहीं बड़ा संकल्प था। उन्होंने ब्रिटिश शासन के प्रतिनिधि स्टेनली जैक्सन को निशाना बनाने का फैसला किया था।
दीक्षांत समारोह के दौरान बीना दास ने गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर करीब से पांच गोलियां चलाईं। पहली गोली गवर्नर के बेहद करीब से निकली। कलकत्ता विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति हसन सुहरावर्दी ने हस्तक्षेप करते हुए बीना दास को पकड़ लिया और काबू में कर लिया। इसके बावजूद उन्होंने संघर्ष करते हुए अन्य गोलियां चलाने का प्रयास किया। हालांकि उनकी कोई गोली गवर्नर को नहीं लगी। बीना दास को तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेजी सरकार ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाया और हत्या के प्रयास के आरोप में उन्हें नौ वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। जेल में उन्हें अनेक यातनाएं दी गईं। अंग्रेज अधिकारी उनके क्रांतिकारी साथियों के नाम जानना चाहते थे और उन पर काफी दबाव बनाया गया, लेकिन बीना दास ने किसी भी साथी का नाम बताने से इनकार कर दिया। उन्होंने यातनाएं सहना स्वीकार किया, लेकिन अपने साथियों के साथ विश्वासघात नहीं किया। उनकी यह दृढ़ता उनके क्रांतिकारी व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान बन गई।
बीना दास ने अपने बयान में ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपने आक्रोश को स्पष्ट किया था। उनका मानना था कि विदेशी शासन के अत्याचार के सामने चुप रहना उचित नहीं है। उन्होंने कहा था कि बंगाल का गवर्नर उस शासन व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है, जिसने करोड़ों भारतीयों को गुलामी की जंजीरों में जकड़ रखा है। उनका उद्देश्य इस व्यवस्था को चुनौती देना था। उनकी कार्रवाई ने अंग्रेजी सरकार को यह संदेश दे दिया था कि भारत की युवा पीढ़ी अब गुलामी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। जेल जाने के कारण बीना दास की शिक्षा भी प्रभावित हुई। कलकत्ता विश्वविद्यालय के ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके क्रांतिकारी रुख के कारण उनकी स्नातक की डिग्री रोक दी। जिस डिग्री को लेने के लिए वह दीक्षांत समारोह में पहुंची थीं, वही डिग्री उन्हें उस समय नहीं मिल सकी। वर्ष 1937 में प्रांतों में कांग्रेस की सरकारें बनने के बाद राजनीतिक बंदियों की रिहाई का सिलसिला शुरू हुआ। महात्मा गाँधी के प्रयासों से 1939 में बीना दास भी जेल से रिहा हुईं। जेल से बाहर आने के बाद उनके विचारों में भी बदलाव आया। उन्होंने महसूस किया कि हिंसा किसी भी आंदोलन का स्थायी रास्ता नहीं हो सकती। इसके बाद वह कांग्रेस से जुड़ीं और राष्ट्रसेवा के दूसरे रास्तों पर आगे बढ़ीं। देश की आजादी के लिए उनका संघर्ष इसके बाद भी जारी रहा। वर्ष 1942 में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो बीना दास ने भी इसमें सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने हाजरा में एक बैठक आयोजित की। ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और वर्ष 1942 से 1945 तक उन्हें फिर जेल में रहना पड़ा। इस प्रकार बीना दास ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई बार जेल की यातनाएं सहीं और अपना पूरा जीवन देश की आजादी के लिए समर्पित कर दिया।
देश आजाद होने के बाद भी बीना दास राष्ट्रसेवा से दूर नहीं हुईं। वर्ष 1946 में वह बंगाल प्रांतीय विधान सभा की सदस्य चुनी गईं और 1946 से 1951 तक पश्चिम बंगाल विधान सभा की सदस्य रहीं। महात्मा गाँधी की नोआखाली यात्रा के दौरान उन्होंने राहत और पुनर्वास कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाई। देश के विभाजन के समय जब लाखों लोग विस्थापित हुए तो बीना दास ने शरणार्थियों की मदद के लिए भी काम किया। वर्ष 1947 में उन्होंने अपने साथी क्रांतिकारी जतीशचंद्र भौमिक से विवाह किया। सामाजिक कार्यों में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1960 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। उन्होंने कुछ समय तक स्कूलों में शिक्षण कार्य भी किया।
लेकिन बीना दास के जीवन का अंतिम दौर बेहद पीड़ादायक रहा। पति की मृत्यु के बाद उन्होंने स्वयं को सामाजिक जीवन से लगभग अलग कर लिया। उन्होंने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलना-जुलना भी कम कर दिया। बाद में उन्होंने कलकत्ता छोड़ दिया और ऋषिकेश में रहने लगीं। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्हें आर्थिक अभाव और अकेलेपन का सामना करना पड़ा। जिस महिला ने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया था, वही स्वतंत्र भारत में गुमनामी और गरीबी का जीवन जीने के लिए मजबूर हो गई।
26 दिसंबर 1986 को बीना दास का निधन हो गया। उनका अंत इतना दर्दनाक था कि आज भी उसे याद करके मन विचलित हो जाता है। ऋषिकेश में सड़क किनारे उनका शव बेहद खराब और क्षत-विक्षत अवस्था में मिला। तत्काल उनकी पहचान नहीं हो सकी। काफी समय बाद पता चला कि सड़क किनारे मिला वह अज्ञात शव किसी सामान्य महिला का नहीं, बल्कि देश की महान स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी बीना दास का था। यह घटना केवल एक महान क्रांतिकारी महिला के जीवन का दर्दनाक अंत नहीं थी, बल्कि हमारे सामने एक गंभीर सवाल भी छोड़ गई कि जिस महिला ने देश की आजादी के लिए अंग्रेजी शासन से लोहा लिया, जेल की यातनाएं सहीं और अपना पूरा जीवन राष्ट्र के नाम कर दिया, उसके अंतिम समय में हम उसे पहचान तक नहीं सके। बीना दास के साथ अंग्रेजी शासन द्वारा किया गया अन्याय उनकी डिग्री के मामले में भी सामने आता है। अंग्रेजी सरकार के दबाव में कलकत्ता विश्वविद्यालय ने उनकी स्नातक की डिग्री रोक दी थी। स्वतंत्रता के लगभग 65 वर्ष बाद वर्ष 2012 में कलकत्ता विश्वविद्यालय ने उन्हें मरणोपरांत स्नातक की डिग्री प्रदान की। उनकी साथी क्रांतिकारी प्रीतिलता वाद्देदार की डिग्री भी इसी तरह रोक दी गई थी और उन्हें भी मरणोपरांत प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया। यह सम्मान महत्वपूर्ण था, लेकिन सवाल यह है कि इतनी महान क्रांतिकारी को यह सम्मान उनके जीवनकाल में क्यों नहीं मिल सका?
बीना दास को केवल उस घटना के लिए याद करना उचित नहीं होगा, जब उन्होंने अंग्रेज गवर्नर पर गोलियां चलाई थीं। उनका पूरा जीवन संघर्ष, त्याग और राष्ट्रसेवा की मिसाल है। उन्होंने उस दौर में क्रांति का रास्ता चुना, जब महिलाओं के लिए घर की चारदीवारी से बाहर निकलना भी आसान नहीं था। उन्होंने यह साबित किया कि देशभक्ति किसी एक वर्ग या लिंग की जिम्मेदारी नहीं है। भारत की बेटियों ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में अपना जीवन दांव पर लगाया और देश को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
बीना दास की जयंती पर उन्हें याद करना केवल एक महान क्रांतिकारी को श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह हमारी जिम्मेदारी भी है कि उनकी कहानी नई पीढ़ी तक पहुंचे। आजादी हमें आसानी से नहीं मिली। इसके पीछे हजारों स्वतंत्रता सेनानियों का संघर्ष और बलिदान छिपा है। बीना दास उन महान सेनानियों में थीं, जिन्होंने अपने वर्तमान को देश के भविष्य के लिए कुर्बान कर दिया। आज जरूरत है कि बीना दास जैसी महान महिला क्रांतिकारियों के योगदान को इतिहास के पन्नों से निकालकर समाज के सामने लाया जाए। स्कूलों और कॉलेजों में उनकी जीवनी पढ़ाई जाए और युवाओं को उनके साहस और राष्ट्रप्रेम से परिचित कराया जाए। बीना दास का जीवन हमें अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने, देश के प्रति अपने कर्तव्यों को समझने और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देता है। भारत की इस महान ‘अग्निकन्या’ ने गुलामी के खिलाफ बंदूक उठाई, जेल की यातनाएं सहीं, अपने साथियों के साथ विश्वासघात नहीं किया, भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और स्वतंत्र भारत में भी राष्ट्रसेवा की। इसके बावजूद उनका अंतिम जीवन गुमनामी में बीता और उनका अंत बेहद दर्दनाक परिस्थितियों में हुआ। यह हमारे लिए आत्ममंथन का विषय है।
बीना दास भले ही 26 दिसंबर 1986 को इस दुनिया से विदा हो गईं, लेकिन उनका साहस, त्याग और राष्ट्रप्रेम कभी भुलाया नहीं जा सकता। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उनका नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जायेगा। महान क्रांतिकारी ‘अग्निकन्या’ बीना दास को उनकी जयंती पर आदर्श समाज समिति इंडिया परिवार नमन करता है।
लेखक – धर्मपाल गाँधी
अध्यक्ष आदर्श समाज समिति इंडिया