ग़ज़ल- वो क़तरा हो के भी दरिया लगे है

ग़ज़ल- वो क़तरा हो के भी दरिया लगे है

ग़ज़ल- वो क़तरा हो के भी दरिया लगे है

बताऊँ क्या तुम्हें कैसा लगे है

हक़ीक़त से जुदा दुनिया लगे है

नज़र जो आ रहा है आइने में

कहीं देखा सा वो चेहरा लगे है

तुम्हारा साथ है हमदम तभी तो

सफ़र जीवन का ये अच्छा लगे है

मुहब्बत के पड़े हैं फेर में क्यों

अगर घाटे का ये सौदा लगे है

है तुझसे राबता जन्मों का शायद 

तभी जीवन का तू हिस्सा लगे है

ख़ुशी औरों की चुभ जाती है तुमको

तुम्हारा दिल बहुत छोटा लगे है

समय पर काम जो आ जाए *हीरा*

वो क़तरा हो के भी दरिया लगे है

            हीरालाल यादव *हीरा*