आल्हा छंद : कण-कण में हरि ---डाॅ. छाया शर्मा

आल्हा छंद : कण-कण में हरि ---डाॅ. छाया शर्मा

16/15 मात्राभार, चरणांत- 2,1

आल्हा छंद : कण-कण में हरि ---डाॅ. छाया शर्मा

जल में थल में नभ-मंडल में,

गिरि-श्रृंगों में श्री भगवान।

तरु-वन में पुष्पित उपवन में,

जग में होता हरि सम्मान।।

दृग-पथ में जब दीप जले हों,

मिट जाए संशय अज्ञान। 

नर में नारायण मिल जाए, 

तब मिट जाए हर अवसान ।।

जो परहित में जीवन अर्पित, 

मिल जाता भगवद का ज्ञान। 

दम्भ शिलाओं का खंडन कर,

मानव बन जाता इंसान ।।

वाणी में जब करुणा होती,

वहीं मिले प्रभु का वरदान।

सागर के अवगाहन भीतर,

लहरें करती तब गुण-गान।।

जाति-धर्म का भेद नहीं हो,

मानवता हो मूल विधान। 

मनुज मनुज का मन मिल जाए

परमेश्वर का होता ध्यान ।।

धरा गगन में समय-चक्र से 

हरि-छंदों का होता ज्ञान।

अंतस में जब ईश बसे हैं,

बने भक्ति तब ही विज्ञान।

मैं का क्षय जब भी हो जाए,

शेष बचे केवल भगवान।

अंतर्यामी को पहचानें,

 मिले दिव्य उनको परिधान।।

---डाॅ. छाया शर्मा, अजमेर, राजस्थान