केन्द्रीय बजट आम आदमी के प्रति उदासीन - कविया
केन्द्रीय बजट आम आदमी के प्रति उदासीन - कविया
रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार पवन पहाड़िया
मूंडवा - अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के संस्थापक लक्ष्मण दान कविया ने बजट पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए केंद्रीय बजट को आम आदमी के लिए उदासीन होने की संज्ञा दी है। कविया ने कहा कि बजट की घोषणा के बाद एनडीए के घटक दल सहित भाजपा बजट के नाम पर वाही वाही लूट रही है। बजट केवल शब्दजाल एवं आंकड़ों का उलझाड़ है। इसमें देश के गरीब, मजदूर, किसान, कर्मचारी,छोटे व्यापारी, साहित्यकार, पत्रकार तबके के लिए कोई उत्साह पैदा करने वाली बात नहीं है। इन तबको की समस्याओं के निराकरण के लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं रखा है। आम आदमी अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहा है। भाजपा में बड़े नेता आम कार्यकर्ता की सुनते ही नहीं। निराश कार्यकर्ता छटपटाकर रह जाते है। शीर्ष पदों पर विराजमान महानुभावों ने पूरे देश में प्रचार का ऐसा चक्रव्यूह रचा है जिसमें सब फंसते जा रहे है। किसी को भी कमीशनखोरी के चक्कर में जिम्मेदार नहीं ठहराया जा रहा है। देश में भ्रष्टाचार, बलात्कार, साईबर ठगी, नशाखोरी, मिलावट को मिटाने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किये जा रहे हैं। इस प्रतिकूल परिस्थितियों में आम आदमी त्रस्त है फिर बजट को मस्त कैसे कह सकते है। जिस बजट में आम आदमी को राहत नहीं मिलती वो बजट कैसे सराहा जा रहा है। साहित्य अकादमियों पर सरकारी पहरे लगाये जा रहे है। देश को दिशा दिलाने एवं देने वाले साहित्यकार एवं पत्रकारों के लिए उत्थान के कोई उपाय इस बजट में नहीं किये गए हैं। कविया ने स्पष्ट किया कि भाषाओं की मान्यताओं के लिए दोहरे मापदंड अपनाये जा रहे हैं। कविया ने संकेत दिया कि प्रदेश का बजट भी कमोबेश ऐसा ही आने वाला है। डबल इंजन की सरकार केवल प्रचार माध्यमों से जनता से वाह-वाही लूटना चाहती है अंदर ही अंदर सब घुटन महसूस कर रहें हैं। भाजपा सत्ता में स्विस बैंक से काला धन लाकर गरीबों में बांटने के वादे पर आई थी लेकिन सत्तासीन होते ही उस वायदे को हमेशा हमेशा के लिए भुला दिया। पिछले 10 वर्षों में स्विस बैंक में पांच गुणा काला धन बढ़ जाने की बातें चल रही है। भाजपा के उस वादे को आज जनता भी भूल चुकी है।