राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कर करोड़ों राजस्थानी भाषियों को न्याय दिलाएं : लक्ष्मण दान कविया
राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कर करोड़ों राजस्थानी भाषियों को न्याय दिलाएं : लक्ष्मण दान कविया
राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग तेज
वरिष्ठ पत्रकार पवन पहाड़िया
नागौर। राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की मांग को लेकर अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के मुख्य अंतरराष्ट्रीय संरक्षक एवं संस्थापक लक्ष्मण दान कविया (गढ़वी) ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नाम एक विस्तृत विज्ञापन जारी कर केंद्र सरकार का ध्यान आकृष्ट किया है।
ज्ञापन में कहा गया है कि राजस्थानी भाषा राजस्थान की प्रतीक भाषा होने के साथ-साथ विश्व के लगभग 16 करोड़ लोगों की मातृभाषा है तथा यह विश्व की तेरहवीं और भारत की तीसरी साहित्य-समृद्ध भाषा मानी जाती है। ऐतिहासिक तथ्यों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि अंग्रेज़ी शासनकाल में ही 1901 में राजस्थानी भाषा को प्रशासनिक मान्यता प्राप्त थी तथा 1911 के एडमिनिस्ट्रेटिव गजेटियर ऑफ इंडिया के अनुसार पंजाबी के बाद सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा राजस्थानी थी।
श्री कविया ने कहा कि आज़ादी के बाद राजस्थानी भाषा को हाशिये पर डाल दिया गया, जबकि आज भी सैकड़ों साहित्यिक कृतियाँ प्रकाशित हो रही हैं। संवैधानिक मान्यता के अभाव में इस समृद्ध साहित्य और इसके सृजनकर्ताओं को अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदी राष्ट्रभाषा है और उसका सम्मान सर्वमान्य है, किंतु जनसंपर्क, सांस्कृतिक विकास और आमजन से संवाद के लिए मातृभाषा का स्थान कोई अन्य भाषा नहीं ले सकती।
प्रेस नोट में यह भी स्मरण कराया गया कि 25 अगस्त 2003 को राजस्थान विधानसभा ने सर्वसम्मति से राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने का संकल्प पारित किया था, तथा जनगणना 2011 में लगभग 4 करोड़ 70 लाख लोगों ने अपनी मातृभाषा राजस्थानी दर्ज कराई, जो प्रदेश की लगभग 80 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करती है।
अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति ने गांधीवादी, शांतिपूर्ण संघर्ष में विश्वास जताते हुए प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि वे राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कर करोड़ों राजस्थानी भाषियों को न्याय दिलाएं, जिससे राजस्थान का चहुंमुखी विकास सुनिश्चित हो सके।