काव्य-कलश की गोष्ठी में कविताओं की बही रसधार 

काव्य-कलश की गोष्ठी में कविताओं की बही रसधार 

काव्य-कलश की गोष्ठी में कविताओं की बही रसधार 

सोजत। काव्य-कलश गोष्ठी: शहीद भगतसिंह के अवतरण दिवस को समर्पित-

"आजादी की अलख जगा दी"- हर्ष मीणा.

महकती लहकती बलखाती साहित्यिक संस्था काव्य-कलश की गोष्ठी में चौदह कवियों, कवयित्रियों, शायरों के साथ प्रसिद्ध जादूगर गोपाल ने आज अपने फन का लोहा मनवा दिया।

ढाई घंटे तक चले कार्यक्रम का आगाज जुगल किशोर सारस्वत ने कविता- 'घुटन' और 'मतलबी रिश्ते' से किया। राजेश मोहता ने- 'न चांद रोया न ही भीगी पलकें सितारों की' तो ओमप्रकाश गोयल 'सायर' ने-'हे लक्ष्मी माता मेरे दर भी आओ' का आह्वान किया।

कार्यक्रम की अध्यक्ष डॉ. दीपा परिहार का कलाम-'पास में रोज पलता है कोई' ने चेतना को झंकृत कर दिया।अब्दुल रहीम सांखला ने-'काली कमाई तो काली ही है' पर चोट की। पत्रकार, कहानीकार एवं कथावाचक मिश्रीलाल पंवार ने सस्वर मीराबाई का प्रसिद्ध भजन-' मैं जाण्यो नाहीं, हरी से मिलन कैसे होय' सुनाया।

अशफ़ाक अहमद फौजदार ने गजल- 'इजहार-ए-इश्क करना कितना मुश्किल है' ने सुनाकर महफ़िल में मोहब्बत का रंग घोल दिया। डॉ. तृप्ति गोस्वामी 'काव्यांशी' ने जनहरण घनाक्षरी छंद में -'पल-पल प्रकृतिय,खंड-खंड बिखरत. तो प्रसिद्ध पर्यावरणविद प्रदीप शर्मा ने गीत -'ये वादियां ये फिजाएं बुला रही है तुम्हें' सुनाया। मनोहरसिंह राठौड ने 'बाजुओं के बंधे ताबीज, आदमी का नहीं नंबर बताते हैं' व श्याम गुप्ता 'शान्त' ने दो कविताएं -'दो रोटी' व 'मैं तो एक मुसाफ़िर ठहरा' सुनाई। वीरेंद्र पुरी ने एक दिलकश गीत-' तुम्हारी जुल्फों के साये में' सुनाया।

कार्यक्रम का संचालन अशफाक अहमद फौजदार ने व सचिव श्याम गुप्ता 'शान्त' ने धन्यवाद ज्ञापित किया।