चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी आने के बाद विभागों से हटे होमगार्ड सरकार स्थाई रोजगार उपलब्ध में हुई फेल
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चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी आने के बाद विभागों से हटे होमगार्ड सरकार स्थाई रोजगार उपलब्ध में हुई फेल
दौसा - एक वर्दी है जो सड़कों पर दिखती है, गश्त में दिखती है, थाने के बाहर दिखती है। पुलिस जैसी लगती है, पर पुलिस नहीं है।
इस वर्दी का अपना घर तो है, पर अपना काम नहीं है। दूसरे विभाग को जरूरत हो तो बुलावा आ जाता है, जरूरत खत्म तो भुला दिया जाता है।
कुछ साल अच्छे निकले थे। लगातार ड्यूटी मिलती रही। घर में चूल्हा जलता रहा। बच्चों की फीस भरती रही। लगा था अब जिंदगी पटरी पर आ गई।
पर अब फिर वही अंधेरा लौट आया है। अब लिस्ट से नाम गायब है। महीनों तक ड्यूटी नहीं आएगी। सुबह वर्दी की जगह सादे कपड़ों में तैयार होकर मजदूरी करने निकलना पड़ रहा है। अब रक्षक नहीं, मजदूर बनकर परिवार का पालन पोषण करने को मजबूर हैं। इससे बड़ा दर्द क्या होगा कि वर्दी पहनने वाला हाथ ईंट-गारा ढोने को मजबूर हो जाए।
सबसे बड़ा जख्म ये है कि इस व्यवस्था के पास अपने लोगों के लिए खुद का कोई रोजगार नहीं है। न अपना थाना, न अपना स्थाई पद। पूरी जिंदगी दूसरों की दया पर। जब तक मांग है, तब तक काम है।
सोचिए, 20 साल जिसने कानून व्यवस्था संभाली, कोरोना और चुनाव में रात-रात भर जागकर बूथ संभाले, आज उसी के घर में रोजी-रोटी के लाले हैं। न फिक्स वेतन, न साल भर की गारंटी, न बुढ़ापे का सहारा। रिटायर हुआ तो नाममात्र का खर्चा।
वो सिर्फ एक ही बात पूछता है, जब मुझे वर्दी दी है तो मेरी नौकरी अस्थाई क्यों है? जब मैं हर विभाग के लिए काम करता हूं तो मेरे अपने विभाग के पास रोजगार क्यों नहीं है?
सरकारें आती हैं, नई भर्तियों के आंकड़े देकर चली जाती हैं, पर जो बरसों से खड़ा है उसकी आंखों के आंसू कोई नहीं देखता।
सच यही है कि विभाग तो है पर स्वयं का कोई रोजगार नहीं है। स्थाई पद हैं, स्वयंसेवक अस्थाई हैं। अपना थाना, अपना बजट नहीं, यह पूरी तरह मांग पर निर्भर है।
इसलिए इस विभाग को दूसरों पर निर्भर नहीं, आत्मनिर्भर बनाना होगा। सरकार को हर विभाग में स्थाई तैनाती का कोटा तय करना होगा। वन विभाग, पुलिस विभाग, आबकारी, न्यायालय, अस्पताल, जहां सुरक्षा कर्मी चाहिए वहां होमगार्ड को प्राथमिकता मिले।
जो जवान प्रदेश की सुरक्षा वर्षों से करता आया है, उसे अपने घर की सुरक्षा की चिंता क्यों करनी पड़े? समय आ गया है कि सरकार इस निर्भर विभाग को रोजगार देने वाला विभाग बनाए। जवानों की मांग बहुत बड़ी नहीं है, वे कहते हैं हमें 365 दिन रोजगार दिया जाए। हमें कागजों में स्वयंसेवक नहीं, होमगार्ड माना जाए और पुलिस के समान मानदेय और रिटायरमेंट पर ग्रेच्युटी दी जाए।
ये कहानी जिले सहित उस महकमे के 30 हजार जवानों की है, जिन्हें दुनिया होमगार्ड के नाम से जानती है।