राजस्थानी को भारतीय मूल भाषा में शामिल करें -- कविया-पहाड़िया
अखिल भारतीय राजस्थानी भासा मान्यता संघर्ष समिति नागौर
राजस्थानी को भारतीय मूल भाषा में शामिल करें -- कविया-पहाड़िया
वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल समद राही
डेह / नागौर अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के संस्थापक एवं राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार लक्ष्मणदान कविया व संभागीय महामंत्री पवन पहाड़िया ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को राजस्थानी भाषा को भारतीय मूल भाषा में सम्मिलित करने हित पुरजोर मांग की है ।
पहाड़िया एवं कविया ने ज्ञापन में लिखा कि नई शिक्षा नीति ( 2020 ) के तहत cbsc के छात्रों को कक्षा 9 एवं 10 में तीन भाषा पढाने का अनिवार्य निर्णय लिया है जिसमें दो भाषा भारतीय मूल की होने का प्रावधान भी रखा गया है ।
Cbsc की और से उन भाषाओं को भी सम्मिलित किया गया है जिन्हें संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान नहीं मिला हुआ है । सरकार का यह निर्णय निःसन्देह शिक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि सिद्ध होगी । विद्यार्थीयों को इच्छित भाषाएं पढ़ने का शुभ अवसर मिलेगा साथ ही विश्व भाषाओं को सीखने का सौभाग्य भी हासिल हो सकेगा ।
हम सरकार के इस निर्णय का स्वागत करते हैं , परन्तु हमें खेद इस बात का है कि राजस्थानी भाषा को हर क्षेत्र में कमजोर माना जाता रहा है । लेत्या , लिंबू , भोटी , भोटिया , मिजो , कोकबोरोक , गुरुंग , राई ,पांगखुल और तिब्बती भाषाओं को सीखने का अवसर विद्यार्थीयों को दे दिया गया लेकिन इस शुभ अवसर से राजस्थानी भाषा को वंचित रख दिया गया। स्मरण रहे कि राजस्थानी भाषा विश्व के 16 करोड़ नागरिकों की मातृभाषा है जो राजस्थान की प्रतीक भी है इसका शब्दकोश विश्व पटल पर अपनी अलग छाप छोड़े हुए है । इसकी लोककथाओं , लोकगाथाओं , कहावतों , लोकगीतों की पहचान अलग ही बनी हुई है । राजस्थान प्रदेश के पांच करोड़ नागरिक इस भाषा का उपयोग दैनिक जीवन में करते आ रहे हैं । राजस्थानी विश्व की तेरहवीं व भारत की तीसरी साहित्य समृद्ध भाषा है । इसका इतिहास हजारों वर्ष पुराना है । अरावली पर्वत के किनारे जिस सरस्वती नदी की सभ्यता का उद्गम हुआ उसकी लोक भाषा राजस्थानी ( मरुभाषा ) ही रही है । यह तथ्य स्वयं ही उजागर हो चुके हैं । सीताकांत महापात्रा की रिपोर्ट में जिन 36 भाषाओं को मान्यता के अनुकूल माना उसमें प्रथम स्थान पर राजस्थानीं को रखा गया है ।
पहाड़िया एवं कविया ने खेद व्यक्त करते हुए लिखा कि हर बार हर क्षेत्र में केंद्र सरकार द्वारा राजस्थान प्रदेश के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता रहा है जबकि प्रवासी राजस्थानी विश्व पटल पर छाए हुए हैं एवं विश्व विकास की धुरी बने हुए हैं । राजस्थान प्रदेश के रणबांकुरों नें देश की सीमाओं की रक्षा के लिए सबसे ज्यादा बलिदान दिए हैं ।
जैसा कि विदित ही है सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पाठ्यक्रम में राजस्थानी भाषा को सम्मिलित करने का अपना महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है । इन्होंने याद दिलाया कि राजस्थान की जनता शांतिप्रिय है वह रोळो - दंगों व उत्पातों में विश्वाश नहीं करती इसलिए देश की आजादी के पहले से अपानी मातृभाषा राजस्थानी को सम्मान दिलाने के लिए गांधीवादी विचारधारा से संघर्ष रत है ।
आजकल सत्तापक्ष शांतिप्रिय आंदोलनों को नजर अंदाज करती आ रही है इसलिये राजस्थानी को कानूनी मान्यता नहीं मिल पाई है ।
इन्होंने लिखा कि राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने पर लाखों बेरोजगार लोगों को रोजगार मिलेगा । कविया एवं पहाड़िया ने आगाह किया कि इसी तरह राजस्थानी की उपेक्षा होती रही तो प्रदेश का युवा वर्ग चुप बैठा रहने वाला नहीं है , विवशतावश उसे उग्र आंदोलन का मार्ग अपनाना पड़ेगा ।