आज के बच्चे, आज की चुनौती
EDITED:- BUREAU CHIEF OMPRAKASH CHOUHAN Report & Writer Akarm Khan
आज के बच्चे, आज की चुनौती
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आज का समय बदल रहा है, और उसके साथ-साथ बच्चों की सोच, आदतें और व्यवहार भी तेज़ी से बदलते जा रहे हैं।
पहले जहाँ बच्चे बड़ों के सामने झिझकते थे, आज वे बिना सोचे-समझे अपनी राय थोपने से भी पीछे नहीं हटते।
हाल ही में कौन बनेगा करोड़पति (KBC) के मंच पर पाँचवीं कक्षा के एक बाल प्रतिभागी का ओवर-कॉन्फ़िडेंस और उसके बाद सोशल मीडिया पर हुई ट्रोलिंग ने इस मुद्दे पर फिर एक बार समाज का ध्यान खींचा है ।
तकनीक और सोशल मीडिया ने बच्चों की सोच में गति तो दी है, लेकिन संयम, अनुशासन, मर्यादा और व्यवहार जैसे संस्कार कहीं धुंधले होते जा रहे हैं।
स्मार्टफ़ोन, रील्स, गेम्स और अनचाही आज़ादी ने बच्चों को वक़्त से पहले “बड़ा” तो बना दिया है, पर “समझदार” नहीं।
असली समस्या यह नहीं कि बच्चे आगे बढ़ रहे हैं - असली समस्या यह है कि वे बिना मार्गदर्शन के आगे बढ़ रहे हैं।
अदब किताबों में रह गया, तहजीब कहानी हो गई,
बचपन की मासूमियत अब, मोबाइल की क़ैदी हो गई।
आज के बच्चों में टैलेंट की कमी नहीं - उनसे ज़्यादा जानकार शायद कोई और पीढ़ी कभी नहीं रही।
लेकिन ज्ञान और घमंड में सिर्फ एक बारीक लकीर होती है। ओवर-कॉन्फ़िडेंस जब बच्चों के मन में घर कर जाता है, तो सीखने की भूख खत्म होने लगती है। प्रतिस्पर्धा का ज़माना है, यह सही है - पर प्रतिस्पर्धा सबसे पहले स्वयं से हो, यह सीखाना ज़रूरी है।

बच्चों को आगे बढ़ाने से ज़्यादा ज़रूरी है, उन्हें जड़ से जोड़े रखना - ताकि उड़ान ऊँची हो, लेकिन पैर ज़मीन पर ही टिके रहें। माता-पिता और शिक्षक यदि मिलकर संयम, शिष्टाचार, संवेदनशीलता और विनम्रता का संस्कार दोबारा मजबूत करें, तभी आज की पीढ़ी कल का मजबूत समाज बन पाएगी।
ऊँची उड़ान भरना तुम, सपनों को सच कर लेना,
मगर घमंड की आग में, ख़ुद को न राख कर लेना।
ज़मीन से जुड़कर रहना, यही है असली काम —
शोर में क्या रखा है, सुनना भी है एक गुणधर्म।
बच्चे बुरे नहीं होते - उन्हें बस सही दिशा, सही उदाहरण और सही मार्गदर्शन की ज़रूरत होती है। सोशल मीडिया उन्हें “स्टार” तो बना सकता है, लेकिन “चरित्रवान इंसान” नहीं। यह ज़िम्मेदारी परिवार, समाज और शिक्षा — तीनों की सामूहिक है।
यदि हम आज बच्चों को संस्कार + तकनीक का संतुलन दे पाए, तो आने वाली पीढ़ी हमसे बेहतर होगी और हमें उन पर गर्व होगा — न कि शर्मिंदगी।