हराम बनाम हलाल, ज़िंदगी का असली हिसाब : अकरम खान 

हराम बनाम हलाल, ज़िंदगी का असली हिसाब : अकरम खान 

हराम बनाम हलाल, ज़िंदगी का असली हिसाब : अकरम खान 

हराम की कमाई इंसान को कुछ वक़्त के लिए चमकदार ज़िंदगी का भ्रम ज़रूर दे सकती है।

 कुछ दिन मौज-मस्ती शानो-शौकत और दिखावे का नशा रहता है, मगर यह नशा बहुत महंगा पड़ता है।

जो धन ग़लत रास्तों से आता है, वो दिल को सुकून नहीं देता, सिर्फ़ आँखों को धोखा देता है। 

अक्सर देखा गया है कि जिसे इंसान ज़िंदगी भर जोड़-जोड़ कर रखता है, वही हराम की कमाई औलाद एक झटके में हराम ही में गंवा देती है।

 शौक़ शहंशाहों वाले, ज़रूरतें आसमान छूती हुईं, और ऊपर से हराम का पैसा तो फिर अंजाम क्या होगा, यह सोचना मुश्किल ही नहीं न मुमकिन है।

*“हराम की दौलत से महल तो बन जाता है,*

*मगर उस महल में सुकून का दिया बुझ जाता है।”*

कहते हैं भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं।

किसी ग़रीब का दिल दुखाकर, किसी मजबूर का हक़ मारकर लिया गया पैसा रब इसी जन्म में, इंसान की आँखों के सामने, किसी न किसी बहाने से वसूल कर ही लेता है। 

कभी बीमारी बनकर, कभी सौदे में घाटा बनकर, कभी ग़लत लत का ज़हर बनकर, तो कभी औलाद के बेलगाम और शहंशाहों वाले शौक़ बनकर।

इसके उलट, मेहनत और ईमानदारी से कमाया गया धन सिर्फ़ जेब नहीं भरता, रूह को सुकून देता है, घर में मोहब्बत रहती है, रिश्तों में मिठास बनी रहती है। 

औलाद से मिलने वाला सुख उम्मीद से कहीं ज़्यादा होता है। मान-सम्मान अपने आप क़दम चूमता है और ज़िंदगी सिर्फ़ लंबी नहीं होती, बल्कि चेहरे पर रौनक साफ़ दिखाई देती है।

ईमानदारी से कमाया गया, हलाल का धन इंसान को अंदर से जवान रखता है क्योंकि वह बोझ नहीं, बरकत होता है।

*“हलाल की कमाई हो तो चेहरे पर नूर रहता है,*

*रब की रहमत से हर रास्ता भरपूर रहता है।”*

रब नेकी के साथ हर दम रहता है।

वह अपने बंदे के माल, संपत्ति और औलाद की हिफ़ाज़त करता है ,उसके कारोबार में इज़ाफ़ा करता है, उसमें बरकत अता करता है और उसकी ज़िंदगी को इत्मीनान से भर देता है।

आख़िरकार, हिसाब सिर्फ़ दौलत का नहीं होता हिसाब नीयत का होता है, और वही नीयत ज़िंदगी की तक़दीर लिखती है।

*अकरम खान पाली*